मौजूँ रहै … दिग्गी के रिलेशन और एन डी टेंशन (मज़ाहिया.... )
ख़ाक़ा उनके अब्बु ने ऐसा खींचा;
कि हम भी गच्चा खा गए ,
बेमेल थी हसरतें तमाम पर ;
करके कोशिशें दोनों निभा गए |
कुदरत को ही होगा मंजूर, इसमें कुछ भला हमारा ओर भी ;
होता नहीं था सबर जिन दिनों,
बंदे ने अंगूर खट्टे ख़ा लिए |
ऐ मेरे मौला किसी को किसी से
इतनी मोहोब्बत भी ना हो जाए ;
सींचा हो जिसने बगीचा जवानी में
बुढापे में उसीके कहर न ढाए |
हो रहा ये जी खट्टा खट्टा , अब कहने से क्या है फायदा ;
वोह आए और नसीब में रोशन
नया चाँद लिखवा ले चले |
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~ प्रदीप यादव ~ ---------------------------------------------------