Wednesday, 2 December 2015

नाराज दोस्त

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नाराज दोस्त
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वोही

नाराज़ था ;
मुझसे
एक दिन
दौड़ पड़ा
मेरी ओर |
मैं मुट्ठियाँ
भींचता ,
उससे पहले
पटक दिया
उसने |
क्यूँ , क्या
बात है ,
मैं थोड़ा
हकलाया |

क्या करता
है यार
गाना सुनते
हुए भी कोई
रोड क्रॉस
करता है,
भला |

मेरे चारों
और बिखरे
सामान
समेट ,
वोह मुझसे
लिपट के
ढाँढस दे
चलता बना |

पास खड़े
लोग मुझे
लानतें
भेज रहे थे ;
मोबाईल
सुनते-सुनते
ये, हमसे
उस कारवाले
की धुनाई ही
करवा देता |
भले आदमी
ने इसके साथ
कारवाले को
भी बचा लिया |

ये मिठाई और
फूल लिए
मैं,
मौत से बचाने
वाले
दोस्त के
ही
घर की
डोरबेल बजा
धन्यवाद
कह रहा हूँ |
नाराज दोस्त
को ना मनाने
के अपने फैसले
से खफ़ा हूँ |

वोही
नाराज़ था ;
मुझसे
एक दिन
दौड़ पड़ा
मेरी ओर |

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~ प्रदीप यादव ~