Saturday, 29 June 2013

कलाम ए अक्सरियात


कलाम ए अक्सरियात  .....


मिलते हैं जब भी कभी जमाने में,
मेरे महबूब दूरी सी बनाए रहते हैं
निगाहों में छुपाने की बातें कर के ,
वोह जाने कहाँ नज़रें चुराए बैठे हैं ।

आज फिर आग से आग बुझाने के,
अरमान दिल में हिलोरें लेते हैं।
मिलता नहीं दिल को सूकून कहीं ,
मस्त निगाही के पियाले जो पिए बैठे हैं।

ए इश्क ज़रा सबर तोह कर,
सुन दीवाने दिल की ताकीद भी,
यूँ हसरतों में सही चाहत के
सहमे सहमे से तूफ़ान समेटे हैं ।

निगाहों में छुपाने की बातें कर के ,
वोह जाने कहाँ नज़रें चुराए बैठे हैं ।

आज तोह सामने रख भी खुल के ,
फरियाद सीने में जो लपेटे है।
मुरीद ए निगाह यहाँ यादों के,
जशने ज़माना मनाए बैठे हैं ।

सुगबुगाहटें लरजते दिलों की ये,
गुल कौन सा नया अब खिलाएंगी
मचलता ये दिल बल्लियों उछलता,
दीदारे महबूब मुसीबत बनाए बैठे हैं ।

निगाहों में छुपाने की बातें कर के ,
वोह जाने कहाँ नज़रें चुराए बैठे हैं । ~ प्रदीप यादव ~







फितरत ए दीवानगी


है फितरत जिनकी रूठना और मनाना,
मर्ज़ ए  दीवानगी के शिकार हो लिए,
हमने  दर्दों  को अपने पाला  भी तोह,
बहाने उल्फत भूल जाने के कह दिए।  
 ~ प्रदीप यादव ~

Hai fitrat jinki roothnaa aur manaana,
marz e dewaangi ke shiqar ho lie 
hamne dardon ko apne palaa bhi toh,
bahane ulfat bhool jane ke Kah die. By ~ PRADEEP YADAV ~

<<<<<<          ..............           >>>>>>


तस्वीर धुंधली दिखा आइना भी पर्दा कर लेता है,
रोती आँख महबूब की ज़माने से बचा ले जाता है । 
 ~ प्रदीप यादव  

Tasvir dhundhli dekh aaina bhi parda kar letaa hai .

roti aankh mahboob ki zamane se bacha le jata hai . ~ PRADEEP YADAV ~

<<<<<<          ..............           >>>>>>

जीने की तौफिक देने वाले से,
उसका अंजाम पूछकर,
क्यों आस की सलाहियतों,
को अंगुठा दिखाएं,
काम चलो ऐसा करें,
कि दिलों में नक्श हो जाए । 
 ~ प्रदीप यादव ~

Jeene ki taufiq dene waale se ,
uskaa anzaam poochh kar,
kyon ? aas ki salaahiyaton ,
ko anguntha dikhaaein,
kaam chlo essa karein,
Ki dilon mein Naqsh ho jaaein .  By 
~ PRADEEP YADAV ~

Saturday, 15 June 2013

शोला दिल


शोला दिल


शोला दिल हूँ ,
राख के एहसास समझता हूँ ।
गमों के कोयले,
धुंआ किया करता हूँ।
जानते हो, कालिख जमा कर,
हर्फों की रोशनाई छापता हूँ ।
काफिर कहते हैं मुझे,खुदा वाले
पंडित अधम समझते हैं।
मैं करता चला दिल की सुन,
वोह दिलजला कहते हैं ।
तमन्नाएं सुर्ख कर,तपिश ये
सहने के इंतजाम करता हूँ ।
मैं बच्चों को आज़ाद कर,
खुद का संस्कार करता हूँ ।
माना बेतरतीब ही सही,
ऐ ज़िंदगी तुझे ,जी लेने
की कोशिश तो करता हूँ ।
  by  ~ प्रदीप यादव ~
 
>>>>>          ...........        <<<<<<


ए जिंदगी तुझे तोह काँटों में भी ढूंढ़ लूँगा,
पता खुशी का महकते गुलों से पूछ लूँगा। ~ प्रदीप यादव ~