शोला दिल
शोला दिल हूँ ,
राख के एहसास समझता हूँ ।
गमों के कोयले,
धुंआ किया करता हूँ।
जानते हो, कालिख जमा कर,
हर्फों की रोशनाई छापता हूँ ।
काफिर कहते हैं मुझे,खुदा वाले
पंडित अधम समझते हैं।
मैं करता चला दिल की सुन,
वोह दिलजला कहते हैं ।
तमन्नाएं सुर्ख कर,तपिश ये
सहने के इंतजाम करता हूँ ।
मैं बच्चों को आज़ाद कर,
खुद का संस्कार करता हूँ ।
माना बेतरतीब ही सही,
ऐ ज़िंदगी तुझे ,जी लेने
की कोशिश तो करता हूँ । by ~ प्रदीप यादव ~
>>>>> ........... <<<<<<
ए जिंदगी तुझे तोह काँटों में भी ढूंढ़ लूँगा,
पता खुशी का महकते गुलों से पूछ लूँगा। ~ प्रदीप यादव ~
No comments:
Post a Comment