Sunday, 27 October 2013

मतलबी रिश्ते



मतलबी रिश्ते 

जल रहा था वोह
 लगी बुझाने की ,
... जरूरत क्या थी ?

उसकी मौत पर
सिसकती उम्मीदें जगाने की
... जरूरत क्या थी ?

युवा होते हौसले को ,
अंगुली पकड़ा चलाने की ,
... जरूरत क्या थी ?

तन वो बेचती थी ,
पेट की आग बुझाने को ,
वादे के तिलिस्म दिखाने की,
 ... जरूरत क्या थी ?


दुत्कार से रूठे अभिमान को

अभी से मनाने की 
... जरुरत क्या थी ?

दोस्त्ती थी जिनसे कल तक;

 उन्हें आजमाने की  
...जरुरत क्या थी ?

जानता हूँ नफरतें दूर करती है ;

दुश्मनों को अपनाने की ....
जरुरत क्या थी ?        
~ प्रदीप यादव

Saturday, 26 October 2013

घोटाले का अवज्ञा आन्दोलन


घोटाले का अवज्ञा आन्दोलन 
           
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ये आचार संहिता हड़पने नहीं देती ईमान !
चुनाव आए देश में भूखे वोटरों को लुभाने |

व्यर्थ है अब रथी बन कर चक्रव्यूह भेदन ,

किया करो आरंभ नई कुप्रथाओं का चलन |

कंस वध करो या फिर कर दो रावण-दहन ,

मूक बन सुनो मृतप्राय मर्यादा के क्रन्दन|

शासकों ने करवाए शोषितों के अभिनंदन ,

अवसरवादी क्योँ भूलें चुनावचक्र में उद्यम ?

बनाओ 
परिवारवाद  के अखंड समीकरण ,
पाचक बूटी पीकर पचालो सारे खाद्यान्न |
ह्रदय-परिवर्तन सत्ताधीश के नए अनुसंधान |
राम मिले फिर प्याज से भूखे के हों भगवान !

सांड लड़ाने जैसा यह रोमांचकारी अनुभव ,

गोदामों में 
रहे अनाज रूपया हो रहा गरीब ,

दाने दाने को तरसते चारे से कुबेर किसान ,
भंग करो विकास भाईचारा मिल करें घोटाला |
 
~ प्रदीप यादव