मतलबी रिश्ते
जल रहा था वोह
लगी बुझाने की ,
... जरूरत क्या थी ?
उसकी मौत पर
सिसकती उम्मीदें जगाने की
... जरूरत क्या थी ?
युवा होते हौसले को ,
अंगुली पकड़ा चलाने की ,
... जरूरत क्या थी ?
तन वो बेचती थी ,
पेट की आग बुझाने को ,
वादे के तिलिस्म दिखाने की,
... जरूरत क्या थी ?
दुत्कार से रूठे अभिमान को
अभी से मनाने की
... जरुरत क्या थी ?
दोस्त्ती थी जिनसे कल तक;
उन्हें आजमाने की
...जरुरत क्या थी ?
जानता हूँ नफरतें दूर करती है ;
दुश्मनों को अपनाने की ....
जरुरत क्या थी ?
~ प्रदीप यादव ~