Tuesday, 21 January 2014


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आह लिखता हूँ तोह वाह कहती हैं ,


जिंदगी भी लफ्जों को यूँ रंगती है |



~ प्रदीप यादव ~




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जब भी मिला हालात पूछती है दुनिया ,


किस्सा बर्बादी का यूँ छुपाती है दुनिया | 



by ~ प्रदीप यादव ~


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मैं दूर खडा जमीं से चाँद तारे देखता रहा ,
वोह उठा गरज कर फलक पर छा गया |

~ प्रदीप यादव ~

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फ़ौरन से पेश्तर लपकती है दुनिया मिले मौकों को ,


मौक़ापरस्त मैं भी नहीं दुआ में बस असर न रहा |



~ प्रदीप यादव ~

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होनहार बेअक्ल दिलों ने क्या क्या न किया ;


इश्क वाली तरकीबें समझे मौत को भूल के |


~ प्रदीप यादव ~ 




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Pani hi toh sirf Pi rahaa thaa woh maykhaane mein baith kar,


Nashaa nahi paimaane mei ,aankhon mei surar utarne ke

sabab KYun dhundhataa tha .



~ Pradeep Yadav ~



पानी ही तोह सिर्फ पी रहा था वोह मयखाने में बैठ कर ;


नशा नहीं पैमाने में आँखों में सुरूर उतारने के सबब क्यूँ ढूंढता था | 


~ प्रदीप यादव ~



दर्द को चूमना भी अमां कोई बच्चों का खेल है भला ,

भट्टी से खौलता लोहा बनना होता है खुदी को गला |



by ~ प्रदीप यादव ~


Thursday, 16 January 2014

एक है हम ...



गुनगुना लें सुनहरे कल के 
संगीत ; 
नाउम्मीदी हुई बीते दिन की बात |  

डगमगाती आस ने की सधी प्रभात ;
हुई ज़िंदगी की नपी तुली शुरुआत |


यूँ ना तोड़िए बढ़ते रहने की कसम ;
भरने लगीं उम्मीदें अब नया भरम ;
होता नहीं फिर बिगड़ जाने का गम ;
पोस रहे हौसले बढते चलने का दम |

होश में फूंकता रहा जोशीले कदम ;
दिलों से आवाज बस यही आती रही;
एक है हम ....
एक है हम ...एक हैं हम |

~ प्रदीप यादव ~