Thursday, 16 January 2014

एक है हम ...



गुनगुना लें सुनहरे कल के 
संगीत ; 
नाउम्मीदी हुई बीते दिन की बात |  

डगमगाती आस ने की सधी प्रभात ;
हुई ज़िंदगी की नपी तुली शुरुआत |


यूँ ना तोड़िए बढ़ते रहने की कसम ;
भरने लगीं उम्मीदें अब नया भरम ;
होता नहीं फिर बिगड़ जाने का गम ;
पोस रहे हौसले बढते चलने का दम |

होश में फूंकता रहा जोशीले कदम ;
दिलों से आवाज बस यही आती रही;
एक है हम ....
एक है हम ...एक हैं हम |

~ प्रदीप यादव ~

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