गुनगुना लें सुनहरे कल के संगीत ;
नाउम्मीदी हुई बीते दिन की बात |
डगमगाती आस ने की सधी प्रभात ;
हुई ज़िंदगी की नपी तुली शुरुआत |
यूँ ना तोड़िए बढ़ते रहने की कसम ;
भरने लगीं उम्मीदें अब नया भरम ;
होता नहीं फिर बिगड़ जाने का गम ;
पोस रहे हौसले बढते चलने का दम |
होश में फूंकता रहा जोशीले कदम ;
दिलों से आवाज बस यही आती रही;
एक है हम ....एक है हम ...एक हैं हम |
~ प्रदीप यादव ~
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