Saturday, 26 April 2014

थोड़ी सी दिल की


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मुकदमे जिंदगी के ,

वकील जिरहबाज़ हो कितना ,

बेदम ये उल्फ़त रहे ;

क्यूँ जीत पे दारोमदार इतना |   


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हम पे हो गया तारी नशा दिल लुटा देने का ;
हर खलिश को उसकी मांग तक निभाने का |

मिलता ही नहीं ,हरेक बेसुध नीद को कहीं, 
आब ए रुखसार से भिगो के, जगाने वाला |


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चाहत ए उल्फत की राह में मंजिले किस की हुई ;

ख़्वाबों की आरज़ूओं मे खाक़ फिर ये हसरतें हुई |
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इंसानी ताक़त ईमानों को सरकश करे ,

पत्थर को खुदा होने पर मजबूर कर दे |

दिल बहलाने महल ए ताज तामीर करे ;
हाथ काट संगतराशो की वोह तारीफ़ कहे |

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~ प्रदीप यादव ~
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मुकदमे जिंदगी के .....


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मुकदमे जिंदगी के ,


वकील जिरहबाज़ हो कितना ,


बेदम ये उल्फ़त रहे ;


क्यूँ जीत पे दारोमदार इतना |



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Muqdame Zindagi Ke ,

Vaqil Zirahbaz ho Kitnaa ;

Bedam Ye Ulfat rahe ;

Kyun Jeet Pe Daaromadar Itnaa .


हम पे हो गया तारी नशा दिल लुटा देने का ;

हर खलिश को उसकी मांग तक निभाने का |


मिलता ही नहीं ,हरेक बेसुध नीद को कहीं,

आब ए रुखसार से भिगो के, जगाने वाला |


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Ham pe ho gaya taari nasha dil luta dene ka ;

har Khalish ko uski Maang tak nibhaane kaa .


Milataa hi nahi harek Beshudh Nind ko kahin ;

Aab E Rukhsar se Bhigo ke Jagaane walaa .


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~ Pradeep Yadav ~

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Tuesday, 1 April 2014

ऊँचे कटाऊट से हाथ जोडे अराध्य .....


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ऊँचे कटाऊट से हाथ जोडे अराध्य .....

चलो ;
मसीहा आ गया हैं ,
हम अब अपनी देखेंगे |

हमारी अपनी सत्ता है 
मान कर ,
अब निश्चिंत हो लें,
हाथ जोड़े आराध्यों को ,
बड़प्पन की असीमित 
क्षमता सौंपें ,
धृष्टता तोह वोह होगी ,
शर्म की कालिख को ,
आँख अंजन बना धारण करें | 

चलो ;
मसीहा आ गया हैं ,
हम अब अपनी देखेंगे |

जो सिखा जमाने से ,
सविनय ही करें ,
अव्यवस्था को सहने का ,
सामर्थ्य उत्पन्न करें | 
महंगे हो रहे ,भाव 
अब मसीहा को , 
खुद को समर्पण करें ,
समृधि शासकीय हुई ,
सिर्फ शासक उपभोग करें |
खुश होईये आप की जीत हुई ,
अब सत्ता की भागीदारी का 
जश्न मनाएं |
स्वराज का 
अधिकार और कर्तव्य ,
सिखा है कीमत का भोग लगा ;
बड़े सामर्थ्यवान 
फिर बन बैठे मसीहा ;
स्वागत करें |
रिसते आँसू से ,
भावना को संतृप्ति देकर ,
अब अपनों की लाचारी ,
की मरहम पट्टी करें |

चलो ;
मसीहा आ गया हैं ,
हम अब अपनी देखेंगे |

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by ~ प्रदीप यादव
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