Saturday, 26 April 2014

थोड़ी सी दिल की


***


मुकदमे जिंदगी के ,

वकील जिरहबाज़ हो कितना ,

बेदम ये उल्फ़त रहे ;

क्यूँ जीत पे दारोमदार इतना |   


***

हम पे हो गया तारी नशा दिल लुटा देने का ;
हर खलिश को उसकी मांग तक निभाने का |

मिलता ही नहीं ,हरेक बेसुध नीद को कहीं, 
आब ए रुखसार से भिगो के, जगाने वाला |


***


चाहत ए उल्फत की राह में मंजिले किस की हुई ;

ख़्वाबों की आरज़ूओं मे खाक़ फिर ये हसरतें हुई |
***

इंसानी ताक़त ईमानों को सरकश करे ,

पत्थर को खुदा होने पर मजबूर कर दे |

दिल बहलाने महल ए ताज तामीर करे ;
हाथ काट संगतराशो की वोह तारीफ़ कहे |

-----------------------
~ प्रदीप यादव ~
----------------------

No comments:

Post a Comment