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मुकदमे जिंदगी के ,
वकील जिरहबाज़ हो कितना ,
बेदम ये उल्फ़त रहे ;
क्यूँ जीत पे दारोमदार इतना |
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हम पे हो गया तारी नशा दिल लुटा देने का ;
हर खलिश को उसकी मांग तक निभाने का |
मिलता ही नहीं ,हरेक बेसुध नीद को कहीं,
आब ए रुखसार से भिगो के, जगाने वाला |
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चाहत ए उल्फत की राह में मंजिले किस की हुई ;
ख़्वाबों की आरज़ूओं मे खाक़ फिर ये हसरतें हुई |
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इंसानी ताक़त ईमानों को सरकश करे ,
पत्थर को खुदा होने पर मजबूर कर दे |
दिल बहलाने महल ए ताज तामीर करे ;
हाथ काट संगतराशो की वोह तारीफ़ कहे |
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~ प्रदीप यादव ~
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