Friday, 17 August 2012

रात का मीठा

  रात का मीठा 

गुजारा दिन रोज की झूठी सच्ची बातों में ,

बातें जिनमें चैन ना था सुकून भरा बेन ना था ।
उडी उडी सी रंगतों और हरकतों से था बेज़ार,
 मुश्किलों का मेरी तो कोई ठिकाना ना था ।

सम्हल कर चलूँ तो डरपोक ,
हंसी ठिठोली ने बनाया लोफर,
कुबुलनामे मेरे नाटकबाज़ी बने ,
रुसवाइयों को तमाम तेवर कहे,
चलता हूँ, शाम भी गहराई है,
सूरज का छूट रहा है साथ,
रात ने दे डाली थी दस्तक ।

भुलाने कडवाहट ज़माने भर
की देर  नहीं करता अज़ीज़ ।

मेरे घर खाने पर मिलने वाला
"रात का मीठा" लगता लज़ीज़।

..... प्रदीप यादव 03 सितम्बर 2012


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