प्रकृति
दर्द ऐ बादल
लोगों गर बरस गया मैं जो झूम कर,
मेरे इस लाड़ को बस यंही भूल कर,
याद से रख लेना हर एक बूँद सहेज कर,
बिखरी धुंध को जैसे तैसे लाया समेट कर,
बारीश बन छलक भी रहा हूँ अनमना,
गरजना कड़कड़ा कर चमकना
भरम है हँसता हूँ खिलखिला कर,
इस रोने को ठहाको का समझो ना जरिया,
उजाड़ कर जंगल तुमने कब्जाए जो दरिया,
मोरों की बस्ती मीठी अमरुद की बगिया,
लौटा दो मेरे दोस्त दरख्त छोटी से चिड़िया ।
...... प्रदीप यादव 22/07/2012
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