Monday, 1 September 2014

अक्षत यादें और पुराना स्वेटर




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 अक्षत यादें और पुराना स्वेटर 
....... By ~ प्रदीप यादव ~

तीन बित्ते ( बिलास ) और 
चार अँगुलियों ;
के नाप ने ठंड से 
बचने का उपाय किया ; 
कितनी ही बार 
पहना होगा मैंने ;
वोह धुल कर उजला 
ही होता गया |

परखा जाँचा था 

वोह सफ़ेद ऊनी स्वेटर ;
खेल के दौरान एक बार
पीछे की ओर 

गेंद की मार से ;
हरा मटमैला सा धब्बा 
पड़ गया था ;
माँ ने ;

धो निचो के सुखाया ;
पर ये तोह अभी भी 
था कायम ; 
मैंने माँ के ;
हाथ देखे उनमें थी
छाले और साबुन 
की खरोंच |
मैंने कुछ सोचा 
स्वेटर को 
साबुन के पानी में 
रात भर गला कर  
सुबह रगड़ के धो दिया | 
अब बड़ा हो गया था ना 
... मैं भी और स्वेटर भी |

स्वेटर,

माँ के लाड़ की तरह
मेरे कालेज की 
क्रिकेट टीम के 
चयन के दौरान
मेरी पीठ पे था |
आज उसमें धब्बा नहीं था ;
पर इसे कैसे 
समझ आता था ;
साल दर साल 
मेरे ही नाप का
 .... हो जाता था |   

आज जब मेरे बच्चे के 

कपडे छोटे हुए तोह 
वही करामाती स्वेटर 
झबला और टोपी बन 
मेरे बेटे पर फबता था |
आशीर्वाद लंबे होते 
है ; कपडे नहीं ...!

मैं समझदार हो रहा था |
बूढी माँ की तिमारदारी 
के लिए नई चप्पल, चश्मा और 
दवाई का बक्सा लाते-लाते,
मैंने बेटे के हाथ 
क्या पकड़ा ...!
दुसरे हाथ से माँ ने 
छोटी सी कलाई थाम ली |
मुझे भान हो रहा था ;
इन सर्दियों में मेरा बेटा 
सँसार का सबसे 
खुशनसीब नन्हा है |    

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~ प्रदीप यादव ~

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