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अक्षत यादें और पुराना स्वेटर
....... By ~ प्रदीप यादव ~
तीन बित्ते ( बिलास ) और
चार अँगुलियों ;
के नाप ने ठंड से
बचने का उपाय किया ;
कितनी ही बार
पहना होगा मैंने ;
वोह धुल कर उजला
ही होता गया |
परखा जाँचा था
वोह सफ़ेद ऊनी स्वेटर ;
खेल के दौरान एक बार
पीछे की ओर
गेंद की मार से ;
हरा मटमैला सा धब्बा
पड़ गया था ;
माँ ने ;
धो निचो के सुखाया ;
पर ये तोह अभी भी
था कायम ;
मैंने माँ के ;
हाथ देखे उनमें थी
छाले और साबुन
की खरोंच |
मैंने कुछ सोचा
स्वेटर को
साबुन के पानी में
रात भर गला कर
सुबह रगड़ के धो दिया |
अब बड़ा हो गया था ना
... मैं भी और स्वेटर भी |
स्वेटर,
माँ के लाड़ की तरह
मेरे कालेज की
क्रिकेट टीम के
चयन के दौरान
मेरी पीठ पे था |
आज उसमें धब्बा नहीं था ;
पर इसे कैसे
समझ आता था ;
साल दर साल
मेरे ही नाप का
.... हो जाता था |
आज जब मेरे बच्चे के
कपडे छोटे हुए तोह
वही करामाती स्वेटर
झबला और टोपी बन
मेरे बेटे पर फबता था |
आशीर्वाद लंबे होते
है ; कपडे नहीं ...!
मैं समझदार हो रहा था |
बूढी माँ की तिमारदारी
के लिए नई चप्पल, चश्मा और
दवाई का बक्सा लाते-लाते,
मैंने बेटे के हाथ
क्या पकड़ा ...!
दुसरे हाथ से माँ ने
छोटी सी कलाई थाम ली |
मुझे भान हो रहा था ;
इन सर्दियों में मेरा बेटा
सँसार का सबसे
खुशनसीब नन्हा है |
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~ प्रदीप यादव ~
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