Tuesday, 24 July 2012

किस तरह मिलूँ ....


किस तरह मिलूँ ....

क्या ! चाहिए ?
क्या, चाहिए ?
अजी क्या चाहिए,हसरतों का देकर भरोसा,
मीठे पलों को खोजने बस निकल जाइए ।
बेमेल दुनिया से नज़र तो मिलाइए ,
मुलायम पड़ रहे तेवर तो दिखाइए,
कुछ मुस्कुरा कर खामोश हो जाइए ,
रूक जाइए पर कंही खो न जाईए ।
रंगीन रातों का कर इंतजार,
उजले दिनों को न भूलाइए ।
अक्षरों की पढ़ी जो वर्णमाला,
गीत उस पर नया रचाइए ।
साजों पर नगमा सुरीला बैठाइए,
मेल स्वरों का नए रागों से कराइए ।
जिस पते से लौटा था ख़त,एक दिन
तबीअत से जरा ख़टखटाइए ।
मिल जाए जो जवाब ए रजामंद ,
फिर इकरार में सर को हिलाइए ,
सरताज अब बहुत हुआ सम पर तो आइए ।
क्या ! चाहिए ?
क्या , चाहिए ?
अजी छोड़िए ,अब चाहिए ही क्या ।    
 प्रदीप यादव  ~     24/07/ 2012


1 comment:

  1. बहुत ही अच्छा लिखते हैं आप Prady जी.
    मेरे ब्लॉग पर आप आये इसके लिए धन्यवाद जी.

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