Wednesday, 19 March 2014

होली गीत

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होली गीत .. (~ प्रदीप यादव ~ )


फाग
में गुल रँग सी खिल जाऊँ ,

मैं भी गुलबीया हो जाऊं रसिया ,


चाशनी भरे बेन जो बोले तू ,

मै चमचम सी हुई जाऊं रे मनबसिया ,

जो तू झूमे संग हलके हौले से ,

मदीरा बन इतराऊँ रे मोरे सरबिया ,

ताड़े हे मुआ पड़ोसी छिछोरा मोहे ,

गारी रे दईके ओहके बरजाऊँ राजा ,

हाय राम उहै जुल्मी रहे भरतार री ,

कहाँ लुकाऊँ( छिपाऊँ ) भीगो बदन ओर अंगिया ,

लागी छेड़न ई दारीं सखीयाँ, सहेलियां ... |

सरकत चुनरी मोरी छुड़ाऊं तोसे ,

ढलकत हरकत लजाऊँ रे बैरी पिया ,

रँग डारो जो मोहे धोखिन जुलमिया ,

हरषत लाजत होरी मनाऊँ रे बलमवा |

रचत रास लिन्हों संग भींच हुरियार पिया ,

महकत जाऊँ , धीर न पाऊँ , संवर संवर जाऊँ ... मैं;

री संवर संवर जाऊँ ..... ,

बलमवा मोरे गुलबीया मैं तोहरी हुई जाऊँ | 



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प्रदीप यादव ~

स्त्री और शक्ति ...



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स्त्री और शक्ति ...


हम कूकती कल्पनाएँ ,

आलिंगनबद्ध हो

मचलना छोड देती हैं |


निस्सिम से

पथरीले फर्श की ,


यात्रारत हो

आकार छोड़ देती है |


निरुद्द होकर

आयामों में नये प्रतिमान ,


नया संविधान रचती है |


अनुपमाएँ औघड़ ही

प्रासारों पर,


प्रतिसादों का

विवरण देती हैं |


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प्रदीप यादव ~

आगाज़ ....



आगाज़  ....

By ~ प्रदीप यादव ~

सूर्य को दिखाए ,
हुनर ने चिराग
अधेरे खूब हुए |

महंगे हो चले है ,
मनुहार , चलो !
अब यलगार हो |

खराब है शराब ,
नशे के घोल ये ,
मुंह खोल गए |

कडवा लगा सच ,
चख कर फिर  ,
झूठा कर गए |  

विषैले थे ईमान ,
हर अक्स को ,
शीशे की सलाह |

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By...~ प्रदीप यादव ~
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