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स्त्री और शक्ति ...
हम कूकती कल्पनाएँ ,
आलिंगनबद्ध हो
मचलना छोड देती हैं |
निस्सिम से
पथरीले फर्श की ,
यात्रारत हो
आकार छोड़ देती है |
निरुद्द होकर
आयामों में नये प्रतिमान ,
नया संविधान रचती है |
अनुपमाएँ औघड़ ही
प्रासारों पर,
प्रतिसादों का
विवरण देती हैं |
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~ प्रदीप यादव ~
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