Wednesday, 19 March 2014

स्त्री और शक्ति ...



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स्त्री और शक्ति ...


हम कूकती कल्पनाएँ ,

आलिंगनबद्ध हो

मचलना छोड देती हैं |


निस्सिम से

पथरीले फर्श की ,


यात्रारत हो

आकार छोड़ देती है |


निरुद्द होकर

आयामों में नये प्रतिमान ,


नया संविधान रचती है |


अनुपमाएँ औघड़ ही

प्रासारों पर,


प्रतिसादों का

विवरण देती हैं |


_________________

~
प्रदीप यादव ~

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