सौ रू. किलो टमाटर ....( कटाक्ष )
इक दिन सम्मलेन में,
कविता बेढंगी पढ़ आया था ,
बीवी की फरमाइश थी टमाटर ,
सो अपनी पे उतर आया था।
क्या मालूम श्रोता थे कंजूस,
सन्नाटे को चीरती सनसनी,
बना खुशियों का सबब तभी ,
जो किसी ने एक फेंका गोला,
उस पर लिपटा कागज़ खोला,
अन्दर लिखा मज़मून बोला,
"गुरूजी आप तोह निकल ही लो,
अगला कवितापाठ को मचल रिया
हैं ये तोह घटिया कविता का
कम्पीटीशन ही चल रिया हैं
इनाम किलो भर टमाटर जो रख दिया हैं "। ~ प्रदीप यादव ~
बहुत खूब..
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