Friday, 5 July 2013

देहरी के भीतर


देहरी के भीतर 

आस की गोरैया,
को बुला लो,
बुझी रौशनी पर,
दीपक जला लो ,
कुछ तोह घटा हे,
उस देहरी के भीतर
वहीँ मिटा लो,
जुगनु की रौशनी में,
लक्ष्य पहचाने नहीं जाते,
अनजान लक्ष्यों पर ,
मज़िलें नहीं मिलती।
यूँ ही दर्दों की,
पहेली नहीं सुलझती।
मन के हारे,
हार नहीं होती।  
जिसने जीती,
बाजी हार कर ।
दुनिया सलामी उसे,
देते नहीं थकती।
~ प्रदीप यादव

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