Monday, 28 May 2012

करम

                   करम 

हाँ मैंने  नज़र लगा  दी अपने ही यार को ,
अब मेरे पास यादों में सहेजा है प्यार को ,

गुजरे बहुत  दिन अब तो  फिर  क्यूँ पर्दा ज़रूरी है,
मुझको तपिश से मतलब,फिर तू जले या जलाए,


सच बस मैं यह कहता हूँ,यारों क्यों चाँद से दूरी है ,

जो अब तक हूँ क्यों तनहा, कैसी यह मजबूरी है,

कर गया था जो गिले शिकवे तेरे दर पर,
क्यों याद रखने जरूरी हैं,
बिक रहा था वो मकान जिसने मंज़र देखा,
बिखरने का मनहूसी है,

यादों के मकबरे पर जाकर फरियाद जाहिर किया करें,
लफ़्ज़ों की ही दरियाफ्त बस एक मेरी तेरी मजबूरी है । 

मेरे आशियाने को रोशन रखने के लिए,
सियाह सामान भी करने जरूरी है।
नज़ारे बेखुदी में देख इस ज़िन्दगी के,
ज़रा सा हंस भर लेने के लिए,
रात चढ़े रो लेना भी तो ज़रूरी है। 
                                                                      .....                    By ... प्रदीप यादव 

कितने दिनों से वो 
रहे कतराते ,
गिरह भी क्या खूब रही नजरो मैं,
इंतजार मैं झुकी थीं ,बही यादों मैं,
फिर खो रही आँखों ही आँखों मैं,
प्याली प्याली मौन ने
आमंत्रित बना लिया ,
अनगिनत भूलों ने मेरी
मुरीद उसका बना दिया ।

   .....प्रदीप 


Thursday, 24 May 2012

अनुपमा



अनुपमा





 
~ ~ ~ अ नु प मा ~ ~ ~

बस यूं समझो भावनाओं को
कह  लेने को लिख लेते हैं।
अवशेष रजकणों की रेख को,
मूर्त रूप कर लेते हैं।
तुम बंधना शब्दों में,
जीवन के विस्तारों को।
हम भी अपना एक कोना,
भींच कर सहेज लेते हैं।
उदास आसमानों पर,
बादलों की कल्पना,
भीगी हवा के सोंधेपन से,
गमकती अल्पना,
भावना की स्याही से,
रचे हर्फ़ॊ को तुम जब भी पढ़ना।
स्मृतियों के पटल पर,
उजास छवि बन दमकना,
तुम हे अनुपमा ... ।

हमको, तुमको अपनेपन
से जोडती है लेखनी,
दो विलग वैचारिकता
का मेल बैठाती सी कुंडली।
तीर आलोचना का भेदता,
अंतस में व्याप्त श्रेष्ठता,
समायोजन का सूचक
तौलता,
व्यवस्था की उत्कृष्ठता,
रंगीन कल्पना का,
श्वेत-श्याम, अभिसार,
निस्तब्ध मौन को ,
झिंझोड़ता सा प्रहार।

जीवन की विदीर्णता का,
संभाव्य तलाशते हम,  
समरसता से दो चार हो,
ढांक कर छुपाई गई ,
कण कण परिलक्षित,
खुशियों को पाने का
'हाहाकार' भुलाने को लिख लेते हैं।

~ प्रदीप यादव ~

Thursday, 17 May 2012


                           कल्कि नया आएगा                                         चाणक्य कोइ नया हूंकारेगा शिखा के बन्धन खोल प्रणेगा जननी का वीर फिर चंद्रगुप्त बन समर में खङग लहराएगा,
         
 संकल्पित हूं, डिगा नहिं, हाला का विकल्प नया हूं ढूंढ रहा,
  संताप, भ्रष्टाचार, विद्रोह को मेरे अवसरों हेतु अब तौल रहा,

  अभ्युदय फिर नवीन ॠचा का उद्धत कर प्रासंगिक होगी राष्ट्रध्येयता,
    आलिंगनबद्ध  निशदिन  होगी सत्य सांस्कृतिक  सफ़लता की श्रेष्ठता,
                                                                          
                         वर्जनाओं को  तोडकर आदित्य के  ईशान  से  दमकेगा भारत न्यारा,
   प्राचीरों के मस्तक पर देवालयों के आंगन में झलकेगा अतिरेक हमारा          .....प्रदीप यादव 

माँ का कोना

               माँ का कोना
  हाँ एक अलग सा कोना था उनके मन में मेरे प्रति ,

  बनाती थी जब खाना तो कहती खा भी ले क्या भूख नहीं ,

  कमरा ठीक किया था तेरा ही पता नहीं,दोस्तों में तो उलझा नहीं ,

  मस्ती वगेरह ठीक है लेकिन टाइम से खाता पीता नहीं ,

  न जाने कब अक्ल आयेगी आप ही कुछ कहो मेरी तो सुनता नहीं ,

  चुपचाप सा रहता है कंहीं तबीअत तो ख़राब नहीं ,

  बडबड बंद कर मेरे साथ चलकर डाक्टर को दिखाता क्यों नहीं,

  जब नहीं थी वो लगा जैसे दुनिया ही मेरी वीरान हो चली ,

  मिटटी के गलने सी रेखाएं खीच रही हैं गालों पर ,

  ये खालिस आंसूं तेरे लिए छोड़ रहा हूँ पर जानता हूँ 'माँ ',
  
  तू जंहा भी होगी इस हवा को छु कहती होगी,
         
          " चुप होता क्यों नहीं "
   
                           

      ....... ~ प्रदीप यादव ~  स्वरचित 

Murde ki Abhilasha



    मुर्दे  की  अभिलाषा  

 मरना था तो मैं मक़बूल हो चला ,

 किसी रोज़ मेरी कब्र पर रोकर कोई हलाकान जी आराम पा जाएगा,

 मज़बूत इरादे वाले भी देखकर मेरी हालत चाहत के शुक्र तलाशैंगे,

 खामख्वाह जीने वालों पर तो दुनिया वाले भी लानतें मलानतें भेजेंगे,

 गिन कर बदले लूँगा जीने वालों से जिस दिन वोह मेरे पड़ोसी  बनेंगे,

 तब पुछुंगा इन कामकाजी बंदो से,

     कि बड़ी फुर्सत मैं मरे हो यार,
         वरना मिलते ही कहते थे,
            समय की कमी ऊपर से काम का भार,

      GOOD NIGHT JI ...........RIP

Monday, 14 May 2012

उलूल-जुलूल

बात बे बात जब तब लड़ झगड़ लेता था,
कभी कुछ तो कभी कुछ कह देता था...
यूँ तो मैं भी हूँ  अब इक इंसाँ,
पहले कभी आदिम  हुआ करता था
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काँटों भरे गुलाब की पंखुड़ी पर बूँद ओस की गोया खूब है ,
सलाहियतें तमाम , दर्द सहने की मेरी भी बड़ी मगरूर है ।... ~ प्रदीप यादव~  
>>>>>>         ......................        <<<<<<यूँ तोह लाख कद्दावर हैं इस जंहाँ में,
बेनजीर तुमसा अहले सुखन नहीं देखा....  ~ प्रदीप यादव~

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दोस्त के लिए दुआ ...
दुश्मन ए जाना मेरे, तू भी क्या गज़ब ये करता है।
कह अलविदा मेरे लिए रोज़े सेहतयाबी के रखता है। ...~ प्रदीप यादव 

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Bahot bolti hain yeh Nigaahein tumahari, bas Zara kam dikha karo,
behad hai ashiq ye nazuk dil ,uass par toh raham kiyaa karo . 
 By ~ Pradeep Yadav ~

बहुत बोलती हैं ये निगाहें तुम्हारी, बस जरा कम दिखा करो,
बेहद है आशिक ये नाज़ुक दिल, उस पर तो रहम किया करो ।  ~ प्रदीप यादव~
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क्यों ना पिएं शराब की हर्ज़ क्या हैं ....
ना भाई जी कोशिश भी ना करना
इसके दीवानों को आज कल लोग पियक्कड़ कह देते हैं ....।
बस मुरीद बन कर चाहतों का इश्क परवान चढाते रहिये ..।
~  प्रदीप यादव ~

बेमिसाल दोस्त

भावनाएं 

शफ़कत(प्रेम) में उनकी सलामती के सज़दे दुआ तमाम किए, 

अदीब( विद्वान्) बेमिसाल वो ठहरे, जीभर दोस्तों के एहतराम किए.

~ प्रदीप यादव ~

 कायदे का फायदा 

 चलो कायदे मैं  रहने  के फायदे भी तो गिनों, 
हमें फिक्र थी कहां डायबीटीज़  की उन दिनों, 
डूबी सी 
चाशनी  मैं,मीठी सी एक  कहानी थी

 कहते थे जानने वाले,सजा है नाफरमानी की,
~ प्रदीप यादव ~


दोस्त की दुआ

दुश्मन ए जाना मेरे, तू भी क्या गज़ब ये करता है।
कह अलविदा मेरे लिए रोज़े सेहतयाबी के रखता है।
 

~ प्रदीप यादव ~ 20\07\2012