माँ का कोना
हाँ एक अलग सा कोना था उनके मन में मेरे प्रति ,
बनाती थी जब खाना तो कहती खा भी ले क्या भूख नहीं ,
कमरा ठीक किया था तेरा ही पता नहीं,दोस्तों में तो उलझा नहीं ,
मस्ती वगेरह ठीक है लेकिन टाइम से खाता पीता नहीं ,
न जाने कब अक्ल आयेगी आप ही कुछ कहो मेरी तो सुनता नहीं ,
चुपचाप सा रहता है कंहीं तबीअत तो ख़राब नहीं ,
बडबड बंद कर मेरे साथ चलकर डाक्टर को दिखाता क्यों नहीं,
जब नहीं थी वो लगा जैसे दुनिया ही मेरी वीरान हो चली ,
मिटटी के गलने सी रेखाएं खीच रही हैं गालों पर ,
ये खालिस आंसूं तेरे लिए छोड़ रहा हूँ पर जानता हूँ 'माँ ',
तू जंहा भी होगी इस हवा को छु कहती होगी,
" चुप होता क्यों नहीं "
....... ~ प्रदीप यादव ~ स्वरचित
हाँ एक अलग सा कोना था उनके मन में मेरे प्रति ,
बनाती थी जब खाना तो कहती खा भी ले क्या भूख नहीं ,
कमरा ठीक किया था तेरा ही पता नहीं,दोस्तों में तो उलझा नहीं ,
मस्ती वगेरह ठीक है लेकिन टाइम से खाता पीता नहीं ,
न जाने कब अक्ल आयेगी आप ही कुछ कहो मेरी तो सुनता नहीं ,
चुपचाप सा रहता है कंहीं तबीअत तो ख़राब नहीं ,
बडबड बंद कर मेरे साथ चलकर डाक्टर को दिखाता क्यों नहीं,
जब नहीं थी वो लगा जैसे दुनिया ही मेरी वीरान हो चली ,
मिटटी के गलने सी रेखाएं खीच रही हैं गालों पर ,
ये खालिस आंसूं तेरे लिए छोड़ रहा हूँ पर जानता हूँ 'माँ ',
तू जंहा भी होगी इस हवा को छु कहती होगी,
" चुप होता क्यों नहीं "
....... ~ प्रदीप यादव ~ स्वरचित
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