Thursday, 17 May 2012

माँ का कोना

               माँ का कोना
  हाँ एक अलग सा कोना था उनके मन में मेरे प्रति ,

  बनाती थी जब खाना तो कहती खा भी ले क्या भूख नहीं ,

  कमरा ठीक किया था तेरा ही पता नहीं,दोस्तों में तो उलझा नहीं ,

  मस्ती वगेरह ठीक है लेकिन टाइम से खाता पीता नहीं ,

  न जाने कब अक्ल आयेगी आप ही कुछ कहो मेरी तो सुनता नहीं ,

  चुपचाप सा रहता है कंहीं तबीअत तो ख़राब नहीं ,

  बडबड बंद कर मेरे साथ चलकर डाक्टर को दिखाता क्यों नहीं,

  जब नहीं थी वो लगा जैसे दुनिया ही मेरी वीरान हो चली ,

  मिटटी के गलने सी रेखाएं खीच रही हैं गालों पर ,

  ये खालिस आंसूं तेरे लिए छोड़ रहा हूँ पर जानता हूँ 'माँ ',
  
  तू जंहा भी होगी इस हवा को छु कहती होगी,
         
          " चुप होता क्यों नहीं "
   
                           

      ....... ~ प्रदीप यादव ~  स्वरचित 

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