अनुपमा
~ ~ ~ अ नु प मा ~ ~ ~
बस यूं समझो भावनाओं को
कह लेने को लिख लेते हैं।अवशेष रजकणों की रेख को,
मूर्त रूप कर लेते हैं।
तुम बंधना शब्दों में,
जीवन के विस्तारों को।
हम भी अपना एक कोना,
भींच कर सहेज लेते हैं।
उदास आसमानों पर,
बादलों की कल्पना,
भीगी हवा के सोंधेपन से,
गमकती अल्पना,
भावना की स्याही से,
रचे हर्फ़ॊ को तुम जब भी पढ़ना।
स्मृतियों के पटल पर,
उजास छवि बन दमकना,
तुम हे अनुपमा ... ।
हमको, तुमको अपनेपन
से जोडती है लेखनी,
दो विलग वैचारिकता
का मेल बैठाती सी कुंडली।
तीर आलोचना का भेदता,
अंतस में व्याप्त श्रेष्ठता,
समायोजन का सूचक तौलता,
व्यवस्था की उत्कृष्ठता,
रंगीन कल्पना का,
श्वेत-श्याम, अभिसार,
निस्तब्ध मौन को ,
झिंझोड़ता सा प्रहार।
जीवन की विदीर्णता का,
संभाव्य तलाशते हम,
समरसता से दो चार हो,
ढांक कर छुपाई गई ,
कण कण परिलक्षित,
खुशियों को पाने का
'हाहाकार' भुलाने को लिख लेते हैं।
~ प्रदीप यादव ~
Gujar ke umr ham bhi ' kitab ' ek ban gaye,
ReplyDeletechand safe padh ke woh dusari or badh gaye |