कल्कि नया आएगा चाणक्य कोइ नया हूंकारेगा शिखा के बन्धन खोल प्रणेगा जननी का वीर फिर चंद्रगुप्त बन समर में खङग लहराएगा,
संकल्पित हूं, डिगा नहिं, हाला का विकल्प नया हूं ढूंढ रहा,
संताप, भ्रष्टाचार, विद्रोह को मेरे अवसरों हेतु अब तौल रहा,
अभ्युदय फिर नवीन ॠचा का उद्धत कर प्रासंगिक होगी राष्ट्रध्येयता,
आलिंगनबद्ध निशदिन होगी सत्य सांस्कृतिक सफ़लता की श्रेष्ठता,
वर्जनाओं को तोडकर आदित्य के ईशान से दमकेगा भारत न्यारा,
वर्जनाओं को तोडकर आदित्य के ईशान से दमकेगा भारत न्यारा,
प्राचीरों के मस्तक पर देवालयों के आंगन में झलकेगा अतिरेक हमारा .....प्रदीप यादव
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