Monday, 27 May 2013




इतना हारा हूँ दोस्तों, कि मजबूरी में जीतना सीख गया। 

तकदीर वालों की सोहबतों में नसीब बनाना सीख लिया॥ ~ प्रदीप यादव ~

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यूँ ही कह गया था गम का फसाना,
थम के रुक गया ये बेदिल ज़माना।

रूह का सवाल था साफ़दिल होना,
वरना जिस्म तो था पुराना अपना। 
~ प्रदीप यादव ~

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चल झूठा !!!
वफादारी की वकालत ज़रूर कोई राज़ है ,
मुफ्त रुस्वाईयाँ सहना भी शऊर होता है ।
 
~ प्रदीप यादव ~

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