Monday, 6 May 2013

हत्या

हत्या

हत्या हुई नारी स्वाभिमान की, 
खंड खंड अनबन है मन की  .....
व्यभिचारिता के संकलन की ....
कोख लजाते अभिशप्त जन की ....
कानूनी व्यवस्था के अशक्तपन की ...
निरंकुश नरपिशाचों की उत्श्रंखलपन की।। ~ प्रदीप यादव

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