Sunday, 5 May 2013

पके फल सी मुहब्बत


  पके फल सी मुहब्बत  


फलसफा ए मुहब्बत, कुछ ऐसे समझिए।
ये किस्मत का युटर्न है आफत ही कहिए। 

जांबाजी से किनारा कर काफिर हो  रहीए।
भेज दिमाग हड़ताल पे दिल को समझिए।


अजीब दर्द की मिठाई इसे तरसाती ज़रूर।
कहते हैं आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई।

राहतें  फैलाती है मुहब्बत जगा इंसानियत।
दिल्लगी होशवालों में भरती है नेकनियती।  


गिरेगी यूँ पके फल सी मुहब्बत आसमां से।
नसीब नहीं उसके ढुंढ़े जो गलियों चौबारे पे।  प्रदीप यादव  ~

इन दिनों यादों की फेहरिस्त पर, 
चर्चे रहे उन्ही के मुख्तसर,
दिल 
आवारा निकला इस क़दर,
घूमफिर जा बैठा तेरे ही दर।
प्रदीप यादव ~   

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