Saturday, 31 August 2013







FB        ९ \८ 

सर्जना तु, हों लाख कई वर्जना ,

ना बन मत-विभाजन की अनुषंगिनी ,
संवेदना बन ना कर अतिरंजना,
लेखनी तू यज्ञोपवित हैं ज्ञान का,
उपासन हैं कमलासना माँ शारदे का,
रह तटस्थ हैं आधार स्व-प्रतिकृति का । ~ प्रदीप यादव


Sarjanaa tu, hon laakh kai varjana,
Naa ban Mat-vibhajna ki anushagini ,
tu samvedana bakar naa kar atiranjna,
lekhni tu YAGYOPAVIT hai gyan ka , 
Upaasan hai MAAN SHARDE KA ,
Rah Tatasth hi aadhaar Sva-pratikruti ka.

~ Pradeep Yadav ~



Sunday, 25 August 2013

  FB           २२ \८  




मेरी देह क्या थी ? बस इक किराएदारी,
बना कर इस सफ़र में बैठा गया सवारी,
सफ़र में हम थे और तुम थे संगी साथी,
रास आती सवारी तभी जाने की तैय्यारी।
  ~ प्रदीप यादव ~ 




Saturday, 24 August 2013

चुनाव आ रहा ,…


चुनाव आ रहा ,… 



कोई अजान लगाए,
पढ़े गीता कोई मेरे रब्बा,
मालिक को बाँट कर,
मिल्कियात पर करे कब्ज़ा,
मेरे मुल्क की सियासी,
रहनुमियात का रखने दावा,
आने वाला है निजाम नया ,
भिड़ा रहा हैं नाप तौल का काँटा,
भरेपेट को मिला चावल आटा,
घोटाले चूसा करे गरीब इलाका,
बांटे गए को घर कब मिलता हैं,
यहाँ सहारों को तूफ़ान मिला है ,
 कश्तिया मेरी है ,सख्त जाँ ,

मंशा पर समंदर की पानी फेरा,

है सख्त सद्भावना का घेरा, 

बिगुल बगावती है फूंका,
रहे हो तकते,रह ही जाओगे,
उन्मादी अंधड हूँ बिखर जाओगे,
 जो बरसा तो तबाही के सैलाब,
बर्बादियों के सबब पुछुंगा ,
 सिमटेगी शर्म की ईंतेहा ,

सराबोर-ऎ-जुर्म,
हो जाओगे पानी-पानी  ।


By 
~ प्रदीप यादव  ~

Thursday, 22 August 2013

शब्दांजलि


शब्दांजलि 

दिवस विस्तारित किरणों के ,
संकल्पों के सत्याग्रह सा गिरीवर,
अविरल जलधारा अर्ध्य चढाती ,
मैदान खलिहान पोसती जाती ,
बांकपन तराई के उर्वर किसलय का ,
पीत हरिताभ अन्नपूर्णा के वरदान,
शंक्वाकार वृक्ष आकाश चुम्बी,
शल्कों के उम्र भरे इतिहासों ने ,
शब्दांजलि हो पढ़ डाली नई।    
   ~ प्रदीप यादव ~



Wednesday, 21 August 2013



मुलाकाती


अच्छा चलो,
याद तोह आया;
वोह बेखबर,
मिलता नहीं है,
आजकल हमीं से,
शुबहा है ! मुझ से,
कुछ रूठा हुआ है ।
  प्रदीप यादव ~

Achhaa chalo,
yaad toh aaya ;
Woh Bekhabar,

Milata Nahi hai ,
Aajkaal hamin se,
shubhaa hai ! mujh se,
Kuchha rutha hua  hai .By ~Pradeep Yadav ~


FB     १३\८

अँधेरे लाख थे मगर;
ये ख्वाहिश ही थी,
जो दर पे तेरे खींच लाती थी।
किस किस को समझाऊंगा,
ना भूल पाने की "आदत" भी,
तोह एक जियादती थी।
~ प्रदीप यादव ~


Andhere Laakh the Magar;
Yeh Khwahish hi thi ,
Jo tere dar pe khinch laati thi ,
Kis kis ko samjhunga,
Yeh Na bhulane ki "aadat" ,
Bhi toh ek jiyaadati thi . ~ Pradeep Yadav ~

जियादती or jiyaadati  =  दुर्व्यवहार Or  Brutality 

Monday, 19 August 2013


FB    ११ \८

करता तोह मैं भी आया गुस्ताखियाँ बेहद ,
सोचा किये था मुड़ जाऊँगा अगले ही मोड़ पे। …
 ~ प्रदीप यादव ~

Kartaa toh mein bhi aaya gustakhiyan behad ,

Socha kiye tha mud jaoonga Agle hi MOD pe .BY ~ Pradeep Yadav ~

FB     १२\८

सरमाया हुक्काम की ना खरीद पाएगी तुझे,
ताज्जुब नहीं उसके जैसे नज़राने ही दे पाते !
किसी और शहर चल संग मेरे दर्द के जिल्द,
सुना है तिज़ारती ग़मों के हमें ढूंढ ही लेते हैं। 
 ~ प्रदीप यादव ~

FB   १२\८ 
Sarmaya Hukkam Ki Na kharid paaegi tujhe.
Taajub nahi uske jaise nazrane hi de pate ,
kisi or shahar chal sang mere dard ke Zild ,
Suna hai Tijarti gumon ke hamein dhundha hi lete hai .
Pradeep Yadav  ~


FB          १४ \८ 


 'साख'

मैं सिखाने चला था ,
दो के चार करने का गणित,
ना पा रहा सुलझा जिस को ,

गुमसुम किनारे बैठा रहा ,
छोड़ हल होने की आस को ,

जाना अनमोल प्यास को,
यूँ बहते पानी का मोल नहीं,
आदम नहीं! पहचान, 'साख' को ।  
 ~ प्रदीप यादव ~

 
'Saakh '

Main  Sikhaane Chalaa tha,

do ke chaar karne ka ganit,
Naa paa raha Suljha jis ko ,
Gumsum  kinaare Baitha rahaa  ,

chhod hal hone ki aas ko,
yun bahte paani ka mol nahi ,
aadam nahi !Pahchan ,'Saakh ' Ko. 
  ~ Pradeep Yadav

Sunday, 18 August 2013


FB    १० \८


दिल हार दिया जब से तुमसे प्यार किया ,
जीते तू ये जग हार को मेरा नसीब किया। ~ प्रदीप यादव ~


FB     ७\८
मनोनूकूल मित्रगणों में मनोवृत्तियां की टकराहट सर्वदा ,
पाठकों \ मित्रों के मनःपटल को क्लांत करती हैं। भावातिरेक में शब्दों के अर्थ खोते जाते हैंऔर निरं - कुश लेखनी हो अथवा वचन; कठोरता का वाहक सदैव वार्तालाप का शिष्टाचार समेकित रूप में निर्वाहित नहीं करते ।
___प्रदीप यादव

Saturday, 17 August 2013



FB     ८ \८  

लिखा करते थे कभी 'दर्द' हम जिसे,
उनकी खुशियों का सामान निकला,
मसरूफ रहने वाले हमें तोह बुलाते ,
क्या इतना ज़बरदस्त काम निकला?

प्रदीप यादव ~

Likha karte the kabhi 'Dard' hum jise,
Unki khushiyon ka saaman nikla .
Masroof rehne waale hamein toh bulate,
Kyaa itanaa Zabardast kaam nikala? Pradeep Yadav ~

Tuesday, 13 August 2013

पगली बूँद



पगली बूँद
________________

चल पगली बूँद ,
बह निकल,
किसी पहाड़ी नदिया सी,
स्वछंद और उंमुक्त,
दूर तक फैले चारागाहों ,
वन-प्रांत की निसर्ग में ,
वनस्पति को सिंचती सरिता,
बह अमृत औषध बन ,
फसलों की अभयदात्रि ,
वर्षाकाल के आकाश की,
"बूँद" तू और तेरे
कई कई स्वरूप ,
निश्छल नन्ही सी थिरकन,
अल्हड़ किशोरि सी भटकन,
तोह कभी शांत सलिला सी स्थावर ,
निर्झर की गहराई लिए ,
मीठा स्वच्छ पय खारा करने,
स्वयं को सागर में समोने में ,
रूपगर्विता नदिया का ,
सोंदर्य शिखर पर होता है।
_______________
 ~ प्रदीप यादव ~
13 AUG 2013 ;  08 : 37 PM 

नाकाफी



बूंदों की बरसात ,
चश्मे के पर्दे ,
नदी की मौजें ,
समंदर की लहरें …
नाकाफी हैं ,
हौसलों की प्यास के आगे।
 ~ प्रदीप यादव ~

Boondon ki Barsaat ,
Chashme ke Parde,
Nadi ki mouzin ,
Samandar ki lehrein ....
Naqafi Hain ,
hauslon kee Pyaas ke aage. Pradeep Yadav ~