Tuesday, 13 August 2013

पगली बूँद



पगली बूँद
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चल पगली बूँद ,
बह निकल,
किसी पहाड़ी नदिया सी,
स्वछंद और उंमुक्त,
दूर तक फैले चारागाहों ,
वन-प्रांत की निसर्ग में ,
वनस्पति को सिंचती सरिता,
बह अमृत औषध बन ,
फसलों की अभयदात्रि ,
वर्षाकाल के आकाश की,
"बूँद" तू और तेरे
कई कई स्वरूप ,
निश्छल नन्ही सी थिरकन,
अल्हड़ किशोरि सी भटकन,
तोह कभी शांत सलिला सी स्थावर ,
निर्झर की गहराई लिए ,
मीठा स्वच्छ पय खारा करने,
स्वयं को सागर में समोने में ,
रूपगर्विता नदिया का ,
सोंदर्य शिखर पर होता है।
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 ~ प्रदीप यादव ~
13 AUG 2013 ;  08 : 37 PM 

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