चुनाव आ रहा ,…
कोई अजान लगाए,
पढ़े गीता कोई मेरे रब्बा,
मालिक को बाँट कर,
मिल्कियात पर करे कब्ज़ा,
मेरे मुल्क की सियासी,
रहनुमियात का रखने दावा,
आने वाला है निजाम नया ,
भिड़ा रहा हैं नाप तौल का काँटा,
भरेपेट को मिला चावल आटा,
घोटाले चूसा करे गरीब इलाका,
बांटे गए को घर कब मिलता हैं,
यहाँ सहारों को तूफ़ान मिला है ,
कश्तिया मेरी है ,सख्त जाँ ,
मंशा पर समंदर की पानी फेरा,
है सख्त सद्भावना का घेरा,
बिगुल बगावती है फूंका,
रहे हो तकते,रह ही जाओगे,
उन्मादी अंधड हूँ बिखर जाओगे,
जो बरसा तो तबाही के सैलाब,
बर्बादियों के सबब पुछुंगा ,
सिमटेगी शर्म की ईंतेहा ,
सराबोर-ऎ-जुर्म,
हो जाओगे पानी-पानी ।By ~ प्रदीप यादव ~
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