Sunday, 30 September 2012

तकरार के नताईल .....

शिकायत क्या करिए,और किस से करीए,
रात उन से लड़ जो लिया था मैं तक़रीबन,
कायदे से रूठ जाना तो बनता ही था उनका,
बस मुझे निकाल दिल से ही  बाहर  किया।

छटपटाते चूहे पेट के सो चले इन्तजार कर,
लानतें मलानतें भेजते मुझ पे तो भी कम था,
गोया तभी कर दीया उन्होने भी तौबा गजब,
लाकर एक बोतल पानी ठंडा जो फीरिज़ का
बिना लिहाज़ किए हम पर  पूरा उंडेल दीया,
पुचकार के पूछा, गुस्सा ठंडा हुआ हुजुर का |

खुशआमदीद तब किया दरवाजा ऐ दिल खोलकर,
बोले बेहतरीन बिरयानी पकाई हैं दम पर चढाकर,
हम भी भरे बैठा किए बेनूर ओ पसमांदा होकर,
मिन्नतों ने चेहरे पर सुकून की मुस्कुराहटें लाकर,
महक से खाने की,गुस्से पर पर पहरा बैठाकर,
खाना खिला रहे हैं,वो नज़्म रूमानी गुनगुनाकर।

.....प्रदीप यादव 29 सितम्बर 2012

Tuesday, 25 September 2012

चिठ्ठी जब आती थी ...

चिठ्ठी जब आती थी ...

लिफ़ाफ़े का पर्दा ओढ़ कर तुम आती थी,
महक से कभी दरबान की फूर्ती से,
चिट्ठी तुम कितनी हसीं हुआ करती थी।
खाकी टोपी पहने डाकिए के अदब से,
लडकियों की दबी हंसी से,
ब्याहता की लरज़ती कनखियों से,
चिढ़ते लड़के की बेखौफ भागदौड से ,
पिता के संतोष भरे चेहरे से,
माँ की अभिमान भरी मुस्कान से,
बस ख़ुशी की 'खबर' के अरमान जगाती थी।  ...चिठ्ठी जब आती थी ...

पर जब पढ़ते-पढ़ते रुक जाना,
या रुक रुक कर पढ़ जाना,
ख्यालों में खो जाना,
बंधे सब्र का टूट जाना,
सपनों का लुटता करारनामा,
सुर्ख रंगों का खो जाना,
किशोर का असमय मर्द हो जाना,
कानूनी मसला हाथ से निकल जाना,
नौकरी न मिलने की हताशा,
दुखी,ये 'खबर' डाकिए की भी,
आँखें नम कर जाती थी।                      
....चिठ्ठी जब आती थी ...

डाकिया बाबू जब मोड़ तक आते
आशा भरी कई जोड़ी नजरों में झांकते,
अपनी साइकल की घंटी घनघनाते,
सपनो का पूरा होना,मंजिल को पा लेना,
ख़ास अवसरों पर,मन का अधूरा होना,
घर की मुश्किलों को एमो(मनीऑर्डर) का इंतजार,
बिटिया के जीवन में आएगी बहार,
नवांकुर के आगमन का समाचार,
सपनो का पूरा होगा आधार,
रूकती जो साइकल,
तकती आँखे जा धंसती,
डाकिए के चेहरे पर,
वो मुस्कुराया समझो पर्व सा आया।
आँख कई डबडबा जाती थी,
......चिठ्ठी जब आती थी
......प्रदीप यादव   26 सितम्बर 2012                        


  

Saturday, 22 September 2012

पैमाइश



   पैमाइश 
हकिकतों की पर्दादारी रखा करो


राज़ स्याह अन्धेरों में भी,


अक्सर नुमाया हो जाते है।


हसरतें नामावरान को 


गाफिल कर देती है।


दिल साफ़ की किस्सागोई 

ने फसाने तमाम बनाए थे।


सच्चाई की न किया करो पैमाइश 

झूठ के हमदर्दों की बस्ती में। 


..... प्रदीप यादव ...22/09/2012


दीवाने भी भला अपनी मंजिलों के रास्ते कब भुला करते हैं,
रफ्ता रफ्ता दिल की गली बखूबी ताड़ कर तलाश लेते हैं ...  by  Pradeep Yadav

'धारा 'नहीं पता तो भी धर लिया , अबे ! कार्टूनिस्ट है वो ,
ख़म नहीं ठोकता तो क्या ' धरा ' को समेटने का दम रखता है ...    By प्रदीप यादव

खामोश रहूँ या फिर कह दूं ,
दुलार की भाषा समझे वही,
जिसे या तो कुदरत 
समझ दे,
या फितरत में तासीर हो।
......( प्रदीप यादव स्वरचित )


एहसान मेरी ज़िंदगी पर तूम्हारा है दोस्तों ,
ये  दिल  तुम्हारे प्यार का  मारा है  दोस्तो ...हिंदीफिल्म गीत की पंक्तियाँ
  


"अधर मैं जनता", भारतीय राजनीती का आधार बन चुकी हैं ।
 अब तो संभल जाओ नहीं तो उखाड़ कर फेंक दिए जाओगे सीरिया,  तुर्की की तरह ....

Wednesday, 19 September 2012

सुबह का पहिया चलता जाए ....
करते हैं चलो हम भी नई खुराफात,
बहाने दोस्तों को कह लें शुभप्रभात,
दौड़े दौड़े दिन का पहिया,
नई आशायें भरता जाए,
रंगीन सपने वादों का ,
बढ़ते और दृढ होते इरादों का,
उड़ान के हौसलों की पाखों का,
नव पल्लवित शाखों का,
भूरी भूरी अभिलाषाओं का,
मोहक चटख श्रंगारों का,
उल्लास यूँ ही बढाता जाए ।   ..... By प्रदीप यादव, 20 सितम्बर 2012



Saturday, 15 September 2012

उपयोगी और विचार शील  लेखन ......

कि खुदा यंहीं है,मैंने सिर्फ लिखा इतना
'प्रदीप' उन्होंने पढ़कर फिर टाल दिया !!!    ......प्रदीप यादव 

Thursday, 6 September 2012

बेवफाई की परख



बेवफाई की परख

परखने में सिर्फ कितने हरज़ाई है हम,
हर्ज़ क्या है बेवफाई के तमगे में सनम ।
न फूलों से आशिकी छूटी
न यादों की मोहताजी हुई कम,
इरादों की मजबूती का तो कायल ज़माना ,
तनहाइयां छुपाने के लिए करते हो जतन ।
......प्रदीप यादव स्वरचित ( 7 सितंबर 2012 )