Tuesday, 25 September 2012

चिठ्ठी जब आती थी ...

चिठ्ठी जब आती थी ...

लिफ़ाफ़े का पर्दा ओढ़ कर तुम आती थी,
महक से कभी दरबान की फूर्ती से,
चिट्ठी तुम कितनी हसीं हुआ करती थी।
खाकी टोपी पहने डाकिए के अदब से,
लडकियों की दबी हंसी से,
ब्याहता की लरज़ती कनखियों से,
चिढ़ते लड़के की बेखौफ भागदौड से ,
पिता के संतोष भरे चेहरे से,
माँ की अभिमान भरी मुस्कान से,
बस ख़ुशी की 'खबर' के अरमान जगाती थी।  ...चिठ्ठी जब आती थी ...

पर जब पढ़ते-पढ़ते रुक जाना,
या रुक रुक कर पढ़ जाना,
ख्यालों में खो जाना,
बंधे सब्र का टूट जाना,
सपनों का लुटता करारनामा,
सुर्ख रंगों का खो जाना,
किशोर का असमय मर्द हो जाना,
कानूनी मसला हाथ से निकल जाना,
नौकरी न मिलने की हताशा,
दुखी,ये 'खबर' डाकिए की भी,
आँखें नम कर जाती थी।                      
....चिठ्ठी जब आती थी ...

डाकिया बाबू जब मोड़ तक आते
आशा भरी कई जोड़ी नजरों में झांकते,
अपनी साइकल की घंटी घनघनाते,
सपनो का पूरा होना,मंजिल को पा लेना,
ख़ास अवसरों पर,मन का अधूरा होना,
घर की मुश्किलों को एमो(मनीऑर्डर) का इंतजार,
बिटिया के जीवन में आएगी बहार,
नवांकुर के आगमन का समाचार,
सपनो का पूरा होगा आधार,
रूकती जो साइकल,
तकती आँखे जा धंसती,
डाकिए के चेहरे पर,
वो मुस्कुराया समझो पर्व सा आया।
आँख कई डबडबा जाती थी,
......चिठ्ठी जब आती थी
......प्रदीप यादव   26 सितम्बर 2012                        


  

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