Sunday, 30 September 2012

तकरार के नताईल .....

शिकायत क्या करिए,और किस से करीए,
रात उन से लड़ जो लिया था मैं तक़रीबन,
कायदे से रूठ जाना तो बनता ही था उनका,
बस मुझे निकाल दिल से ही  बाहर  किया।

छटपटाते चूहे पेट के सो चले इन्तजार कर,
लानतें मलानतें भेजते मुझ पे तो भी कम था,
गोया तभी कर दीया उन्होने भी तौबा गजब,
लाकर एक बोतल पानी ठंडा जो फीरिज़ का
बिना लिहाज़ किए हम पर  पूरा उंडेल दीया,
पुचकार के पूछा, गुस्सा ठंडा हुआ हुजुर का |

खुशआमदीद तब किया दरवाजा ऐ दिल खोलकर,
बोले बेहतरीन बिरयानी पकाई हैं दम पर चढाकर,
हम भी भरे बैठा किए बेनूर ओ पसमांदा होकर,
मिन्नतों ने चेहरे पर सुकून की मुस्कुराहटें लाकर,
महक से खाने की,गुस्से पर पर पहरा बैठाकर,
खाना खिला रहे हैं,वो नज़्म रूमानी गुनगुनाकर।

.....प्रदीप यादव 29 सितम्बर 2012

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