आदरणीय महोदय जी ,
भाषाई विद्वता का प्रश्न यह जताने का प्रयास करता है, की किस तरह अत्याचार के कोड़े
सहकर भी आप एक विदेशी भाषा को सीखने के लिए अनावश्यक रूप से मानसिक ग्लानि
सहन करते हैं ।
विवशता के अधीन आक्रांताओ के प्रशासन और समाज के बीच कडी बनाए जाने के कारण
स्वभावतः भारतीय ही नहीं वरन कोलोनियल सामयिक प्रताडित वर्तमान स्वतंत्र राष्ट्रों के
अंग्रेजीदां कमोबेश इसी तरह की भाषा ज्ञान रखते है। आप ही बताएँ श्रीमान भाषा पर
गहरी पकड के मामले में देश पर 750 साल मुगलों ने शासन किया, उस हिसाब से तो
यह सिद्ध होगा कि अब तक श्रीमान के तो 10 - 12 रिसाले और रुबाइयों की तो अन-
गिनत उन्वान शाया हो चुके होते । जाहिर है जितने भी इंग्लिश स्पीकिंग के मरहले हैं
उनसे कही जियादे हिन्दी की बहन उर्दू और अन्य भाषाओँ के सिखाने वाले संस्थान देश में
भरे पड़े हैं । भाषाई विशेषज्ञता का यह विन्यास भारत की पारिस्थितिक अभूतपूर्वता के
मद्देनज़र इस कारण प्रतिष्ठीत है कि यंहा भाषा की सिर्फ आभिजात्य परंपरा रही है जैसे
यदि आपका आंग्ल भाषा ज्ञान समृद्ध है तो आपको देशज और क्षेत्रीय भाषियों पर एक तरह
का पूर्वाधिकार प्राप्त हो जाता है। महोदय मैं आपका ध्यान इस अतार्किक विषय से हटाकर
भाषा विकास की उन संभावनाओं पर ले जाना चाहूँगा, जब नया नया जन्मा बालक जो
भाषा संस्कृति के सांचे में ढलना सीख रहा होता हैं तब वह भाषा विकास के आरभिक ध्वनी,
वर्ण तथा अक्षर ज्ञान ( सिन्टेक्स, सिलेबल्स तत्पशचात फोंट आदि ) सिखने में 3 से 4 वर्ष
लगाता है । जब ज्ञान की प्रक्रिया निर्बाध रूप से चलती रहती हें , तभी उसके पड़ोस,
शिक्षक, शिक्षा का स्तर और वातावरण उसकी भाषाइ विकास की दशा और दिशा निर्धा -
रण करते हैं। इसी क्रमिक विकास में उसे हिन्दी के साथ इंग्लिश के अतिरिक्त संस्कृत
तथा क्षेत्रीय भाषा भी सिखना होती है । शायद यही कारण था कि उन दिनों पढ़ा - लिखा
इंग्लिश व्यक्ति वाक्य रचना सीखते समय "क्या मांगटा है ", "मेरे को हाट डोना है "," तुम
किटना डेर मैं आटि है।," जैसे सामान्य बोलचाल के शब्द भी नहीं बोलना सीख सके । जबकि
उसी अफसर का देशी अनपढ़ सिपाही " एस सर " " कमिंग सर ", " बेलकम सर", " केन आई
टेक योर कोट ऑफ सर ।" जैसे विदेशी वाक्य प्रयोग कर रहे थे।
रही समाधान की बात तो यह भी निश्चित हो गया की प्रयास इंग्लिश भाषा ही सीखने की ओर
है, भाषा मूलतः ज्ञान की अभि-रुचि का द्रश्य और श्रव्य आकल्पन मात्र होती हैं परन्तु जब
सूचनाएं संप्रेषित करनी हों तो अभिनय (एक्ट ) भी किया जाता है। उदाहरणार्थ, चार अँगु-
लियों को अंगूठे से रगड़ कर शब्द "मुलायम " की या "महीनता " की सुचना देना भाषाइ
संरचना का अभिनव प्रयोग ही तो है । "हम पिट कर आए।" (अर्थ हम सभी की पिटाई से है )
किन्तु " हम पीट कर आए" से तात्पर्य हमारे द्वारा पिटाई किए जाने से है।यह उदाहरण हमारी
भाषी संरचना के भाव संचरण और उससे उत्पन्न प्रतिसंचारी भावनाओं की निष्पत्ति को दर्शाता
है। जब भाषज्ञ अपनी पूर्ण संज्ञानता, उन्नत व्याकरण , तत्सम और तद्भव शब्दों, सामासिक
अलंकरणों, वाद और विवाद के तरीकों, प्रहसन, व्यंगात्मकता, कटाक्ष तथा आलोच्यता ,
गेयता आदी का वर्णन करने मैं सिद्ध हस्त होता है तभी भाषाकारिता के संपूर्ण परिणाम
प्रेषित करने मैं सक्षम इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स डिजाईन होता है, जो की वस्तुतः प्रभावी होगा ।
भवदीय
प्रदीप यादव
भाषाई विद्वता का प्रश्न यह जताने का प्रयास करता है, की किस तरह अत्याचार के कोड़े
सहकर भी आप एक विदेशी भाषा को सीखने के लिए अनावश्यक रूप से मानसिक ग्लानि
सहन करते हैं ।
विवशता के अधीन आक्रांताओ के प्रशासन और समाज के बीच कडी बनाए जाने के कारण
स्वभावतः भारतीय ही नहीं वरन कोलोनियल सामयिक प्रताडित वर्तमान स्वतंत्र राष्ट्रों के
अंग्रेजीदां कमोबेश इसी तरह की भाषा ज्ञान रखते है। आप ही बताएँ श्रीमान भाषा पर
गहरी पकड के मामले में देश पर 750 साल मुगलों ने शासन किया, उस हिसाब से तो
यह सिद्ध होगा कि अब तक श्रीमान के तो 10 - 12 रिसाले और रुबाइयों की तो अन-
गिनत उन्वान शाया हो चुके होते । जाहिर है जितने भी इंग्लिश स्पीकिंग के मरहले हैं
उनसे कही जियादे हिन्दी की बहन उर्दू और अन्य भाषाओँ के सिखाने वाले संस्थान देश में
भरे पड़े हैं । भाषाई विशेषज्ञता का यह विन्यास भारत की पारिस्थितिक अभूतपूर्वता के
मद्देनज़र इस कारण प्रतिष्ठीत है कि यंहा भाषा की सिर्फ आभिजात्य परंपरा रही है जैसे
यदि आपका आंग्ल भाषा ज्ञान समृद्ध है तो आपको देशज और क्षेत्रीय भाषियों पर एक तरह
का पूर्वाधिकार प्राप्त हो जाता है। महोदय मैं आपका ध्यान इस अतार्किक विषय से हटाकर
भाषा विकास की उन संभावनाओं पर ले जाना चाहूँगा, जब नया नया जन्मा बालक जो
भाषा संस्कृति के सांचे में ढलना सीख रहा होता हैं तब वह भाषा विकास के आरभिक ध्वनी,
वर्ण तथा अक्षर ज्ञान ( सिन्टेक्स, सिलेबल्स तत्पशचात फोंट आदि ) सिखने में 3 से 4 वर्ष
लगाता है । जब ज्ञान की प्रक्रिया निर्बाध रूप से चलती रहती हें , तभी उसके पड़ोस,
शिक्षक, शिक्षा का स्तर और वातावरण उसकी भाषाइ विकास की दशा और दिशा निर्धा -
रण करते हैं। इसी क्रमिक विकास में उसे हिन्दी के साथ इंग्लिश के अतिरिक्त संस्कृत
तथा क्षेत्रीय भाषा भी सिखना होती है । शायद यही कारण था कि उन दिनों पढ़ा - लिखा
इंग्लिश व्यक्ति वाक्य रचना सीखते समय "क्या मांगटा है ", "मेरे को हाट डोना है "," तुम
किटना डेर मैं आटि है।," जैसे सामान्य बोलचाल के शब्द भी नहीं बोलना सीख सके । जबकि
उसी अफसर का देशी अनपढ़ सिपाही " एस सर " " कमिंग सर ", " बेलकम सर", " केन आई
टेक योर कोट ऑफ सर ।" जैसे विदेशी वाक्य प्रयोग कर रहे थे।
रही समाधान की बात तो यह भी निश्चित हो गया की प्रयास इंग्लिश भाषा ही सीखने की ओर
है, भाषा मूलतः ज्ञान की अभि-रुचि का द्रश्य और श्रव्य आकल्पन मात्र होती हैं परन्तु जब
सूचनाएं संप्रेषित करनी हों तो अभिनय (एक्ट ) भी किया जाता है। उदाहरणार्थ, चार अँगु-
लियों को अंगूठे से रगड़ कर शब्द "मुलायम " की या "महीनता " की सुचना देना भाषाइ
संरचना का अभिनव प्रयोग ही तो है । "हम पिट कर आए।" (अर्थ हम सभी की पिटाई से है )
किन्तु " हम पीट कर आए" से तात्पर्य हमारे द्वारा पिटाई किए जाने से है।यह उदाहरण हमारी
भाषी संरचना के भाव संचरण और उससे उत्पन्न प्रतिसंचारी भावनाओं की निष्पत्ति को दर्शाता
है। जब भाषज्ञ अपनी पूर्ण संज्ञानता, उन्नत व्याकरण , तत्सम और तद्भव शब्दों, सामासिक
अलंकरणों, वाद और विवाद के तरीकों, प्रहसन, व्यंगात्मकता, कटाक्ष तथा आलोच्यता ,
गेयता आदी का वर्णन करने मैं सिद्ध हस्त होता है तभी भाषाकारिता के संपूर्ण परिणाम
प्रेषित करने मैं सक्षम इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स डिजाईन होता है, जो की वस्तुतः प्रभावी होगा ।
भवदीय
प्रदीप यादव
