Tuesday, 30 October 2012

आदरणीय महोदय  जी ,
भाषाई  विद्वता का प्रश्न यह जताने का प्रयास  करता है, की किस तरह अत्याचार के कोड़े
सहकर भी आप एक विदेशी भाषा को सीखने के लिए अनावश्यक रूप से मानसिक ग्लानि
सहन करते हैं ।
विवशता के अधीन आक्रांताओ के प्रशासन और समाज के बीच कडी बनाए जाने के कारण
स्वभावतः भारतीय ही नहीं वरन कोलोनियल  सामयिक  प्रताडित वर्तमान स्वतंत्र  राष्ट्रों के
अंग्रेजीदां  कमोबेश  इसी  तरह  की भाषा ज्ञान रखते है। आप ही  बताएँ  श्रीमान भाषा पर
गहरी पकड  के मामले में   देश पर  750 साल मुगलों  ने  शासन  किया, उस हिसाब  से तो
यह सिद्ध होगा  कि  अब तक श्रीमान के  तो 10 - 12  रिसाले  और  रुबाइयों   की  तो अन-
गिनत उन्वान शाया हो चुके होते । जाहिर  है जितने  भी इंग्लिश  स्पीकिंग  के  मरहले  हैं
उनसे कही जियादे हिन्दी की बहन उर्दू और अन्य भाषाओँ के सिखाने  वाले संस्थान देश में
भरे पड़े हैं । भाषाई  विशेषज्ञता का यह विन्यास  भारत  की  पारिस्थितिक अभूतपूर्वता  के
मद्देनज़र  इस कारण  प्रतिष्ठीत है कि यंहा भाषा की सिर्फ आभिजात्य  परंपरा रही  है  जैसे
यदि आपका आंग्ल भाषा ज्ञान समृद्ध है तो आपको देशज और क्षेत्रीय भाषियों पर एक तरह
का पूर्वाधिकार प्राप्त हो जाता है। महोदय मैं आपका ध्यान इस अतार्किक विषय से हटाकर
भाषा  विकास  की उन  संभावनाओं पर ले  जाना चाहूँगा,  जब नया नया जन्मा बालक जो
भाषा संस्कृति के सांचे में ढलना सीख रहा होता हैं तब वह भाषा विकास के आरभिक ध्वनी,
वर्ण तथा अक्षर ज्ञान  ( सिन्टेक्स, सिलेबल्स तत्पशचात फोंट आदि ) सिखने में 3 से 4 वर्ष
लगाता है । जब ज्ञान  की  प्रक्रिया निर्बाध  रूप  से चलती  रहती हें ,  तभी  उसके  पड़ोस,
शिक्षक, शिक्षा का स्तर और वातावरण  उसकी भाषाइ  विकास की दशा और दिशा निर्धा -
रण करते हैं। इसी क्रमिक विकास में  उसे  हिन्दी  के  साथ  इंग्लिश  के  अतिरिक्त संस्कृत
तथा क्षेत्रीय भाषा भी सिखना होती है ।  शायद  यही कारण था  कि उन दिनों पढ़ा - लिखा
इंग्लिश व्यक्ति वाक्य रचना सीखते समय "क्या मांगटा है ", "मेरे को हाट डोना है "," तुम
किटना डेर मैं आटि है।," जैसे सामान्य बोलचाल के शब्द भी नहीं बोलना सीख सके । जबकि
उसी अफसर का देशी अनपढ़ सिपाही " एस सर " " कमिंग सर ", " बेलकम सर", " केन आई
टेक योर कोट ऑफ सर ।" जैसे विदेशी वाक्य प्रयोग कर रहे थे।
रही समाधान की बात तो यह भी निश्चित हो गया की प्रयास इंग्लिश भाषा ही सीखने की ओर
है, भाषा मूलतः ज्ञान की अभि-रुचि  का द्रश्य और श्रव्य आकल्पन मात्र  होती हैं  परन्तु जब
सूचनाएं संप्रेषित करनी  हों  तो अभिनय (एक्ट ) भी किया जाता है। उदाहरणार्थ, चार अँगु-
लियों को अंगूठे  से  रगड़  कर शब्द  "मुलायम " की या "महीनता " की  सुचना  देना  भाषाइ
संरचना का अभिनव प्रयोग ही तो है । "हम पिट कर आए।"  (अर्थ हम सभी की पिटाई से है )
किन्तु " हम पीट कर आए" से तात्पर्य हमारे द्वारा पिटाई किए जाने से है।यह उदाहरण हमारी
भाषी संरचना के भाव संचरण और उससे उत्पन्न प्रतिसंचारी भावनाओं की निष्पत्ति को दर्शाता
है। जब भाषज्ञ  अपनी पूर्ण संज्ञानता, उन्नत  व्याकरण , तत्सम और तद्भव  शब्दों, सामासिक
अलंकरणों, वाद  और  विवाद  के  तरीकों, प्रहसन, व्यंगात्मकता, कटाक्ष  तथा आलोच्यता ,
गेयता आदी का वर्णन करने मैं सिद्ध हस्त  होता  है  तभी  भाषाकारिता के  संपूर्ण  परिणाम
प्रेषित करने मैं सक्षम इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स डिजाईन होता है, जो की वस्तुतः प्रभावी होगा ।

भवदीय
प्रदीप यादव

Monday, 29 October 2012

बुढा गया हूँ .....(new year )

आने वाले साल का स्वागत और आप सभी की सम्रद्धि की कामना करते हुए ....
साल का अवसान पर नए और तरंगित साल की ही कल्पना है आप ने जाने वाले साल में
जो भी उपलब्धियां प्राप्त कीं उस हेतु बधाई, अब नए साल की बेला पर पुराने बुढाए साल
की ऊर्जा और स्वयं की असमर्थता प्रकट करती रचना आपके सम्मुख प्रस्तुत है ......


बुढा गया हूँ .....

हांफ कर थक गया हूँ,
मैं थोडा सा गलने लगा हूँ,
वोह जो धुआं सा छाने लगा है,
आइना धुंधलाने लगा है ,
क्या देखूँगा चेहरा वक्त
'बेवक्त'सताने लगा है।
कितने बेतकल्लुफ होते हैं,
आईने भी जो शफ्फाक
दिखा रहे है काज़ल को भी,
मेरी तो इनसे कोई दुश्मनी,
भी ना थी जाने क्यों चेहरे
पर लकीरें अनगिनत उकेर दीं,
सोचा था अभी तोह जी भर,
की है जो मेहनत
मज़ा उसका तो लूं।
मेरे शाने को ताकीद कर दी,
बस नियत भार ढ़ोने की,
नियामक कई लाद
दिए मेरी खुराक पर,
गुजिश्ता चंद लम्हात मे,
उम्र दीख गयी कमर पर,
मैं आइनों को कोसने लगा हूँ ,
शायद असमय बुढ़ाने लगा हूँ।
वर्ना मेरी ही सीख से आईने
साफगोई का इल्म पा रहे थे,
वो तोह सच ही बयाँ करते,हम ही
सामना करने से कतरा रहे थे । ....    प्रदीप यादव (स्व-रचित ) 30 OCT 2012

Saturday, 27 October 2012

bhookh ka Abhaydaan......
Bahane main aaj bhi achhe
banaa liya kartaa haoon,
Jali ko aag aur
bujhee ko Raakh
keh liyaa kartaa hoon .
jalna jalana RaONE hi jaane,

humen to pet ki aag ko hi 
bujhane ke jatan karne the 
kuch log bharpet khilane ki
bat kar mukarte rahe,
hum to langron ki aas mein 
hi yeh JiONE ko dhote rahe ......by Pradeep Yadav

मित्रों पसंद आई हो या दिल को छू  रही हो तो विचार प्रकट जरूर करें । 
रचना की प्रेरणा लाखों खर्च कर जलाए रावणों के चमक दमक और गरीब जनता की खाई का अवसाद है । ...   प्रदीप

बहाने मैं आज भी अच्छे
बना लिया करता हूँ।
लगी को आग और
बुझी को राख
कह लिया करता हूँ।
जलना, जलाना रावण ही जाने,
हमें तो पेट की आग को ही
बुझाने के जतन करने थे ।
 
कुछ लोग भरपेट खिलाने
की 
बात कर बस मुकरते रहे,
हम तो लंगरों की आस में ही,
इस जीवन को सिर्फ ढ़ोते रहे। ..........By ....प्रदीप यादव




  

Monday, 15 October 2012

विश्वास की मंगल कामना ....


  विश्वास की मंगल कामना ....

मंद पड़ रहे चमकीले नयन कैसे दिखलाऊँ ,
दरियाफ्त के इरादे किस तरह समझाऊँ ,
सचमुच ही हालात के द्वार पर
झंझावात से लड़ा हूँ ?
सुबकियां नहीं थी ना ही रुदन,
फैसलों की ठोकरों को सह रहा हूँ ?
ना पर्वों का उल्लास था,
भटक जाने का अहसास था।
सूखा बादल था ठंडे मेह को तरसा हूँ।
खोलकर डब्बे को यादों को भरता हूँ।
महती आवश्यकता, निर्मूल समझता हूँ।
मंगल कामना करता हूँ ?
मैं जतन पहाड़ तोड़ने के करता हूँ ?
गिर गिर कर उठता रहा हूँ,
तब कंही जाकर पैरों पर खड़ा हूँ ?
अब नहीं छोडूंगा ज़िन्दगी का दामन,
प्रीत का वादा निभाने चला हूँ ?
रंग रीती को रंगरेज़ का पता,
बताने चल पडा हूँ।
जिद को डुबाने चल पडा हूँ।
राहों में फूलों की मुंडेर सजाने लग पडा हूँ ।
अधूरे मनमंदिर की मूरत को फिर गढ़ने लगा हूँ ?
फिर से एक बार निखर कर संवरने लगा हूँ।
 ...........प्रदीप यादव  2 OCT 2012

चलो 'मन' को मना लेते हैं ...

बिखरे मनके 'मन' के सहेज लो,
सजा भूलों की कम करो ना करो,
बूँद बूँद अश्रु पर खारे हुए शब्द को,
फिर निःशब्द पिरो लेते हैं,.....
गुंथकर माला शुरुआत नई करते हैं। 
चलो 'मन' को मना लेते हैं ...

.....प्रदीप यादव स्व-रचित 13 OCT 2013

Sunday, 14 October 2012

 SSHHEE  ...  ( शी ... )

भेड़ीऐ यंहाँ घूम रहे है सभ्यता की खाल में ,
मददगार बनकर करने आबरू की तिज़रातें।
विद्रूपताएं अनंत है अश्लील भी
अन्यमयस्क सी है मान्यताएँ,
अनीति की उपासिका सुनितियाँ,
फिर विख्यात या प्रसिद्ध कलाकार,
प्रकटे नेता भी अपनी सीमा लांघकर,
मैंने भुगती हैं यहाँ वर्जनाओं की लागत,
कभी माँ की ही कोख में मारी गई तो
कभी आग में दाहने की बाध्यताएं ।
उहापोह में बंदिशों की कर अवमाननाएं,
अब ना और खुद पर ही शरमाएं,
अपनी संतति से ही आँख मिलाएं,
चलो मिलकर सब बेटियाँ बचाएँ ।   ....... प्रदीप यादव ( स्व-रचित 13 OCT 21012 )


रचना लिखने की प्रेरणा आदरणीया मंजू शरण की रचना जो खाप पंचायतों तथा उन जैसे ही संगठनों
के संस्कृति रक्षण के  नाम हमारे  समाज की लगभग  आधी जनसंख्या के बारे में,  आजकल लगभग
अप्रचलित हो चुकी मान्यताओं का समर्थन करते आ रहे नीति नियंताओं पर कुठाराघात करती है से
मिली। "वर्जना की वनिता" यह नाम दिया है मंजू शरण जी के कवित्त को .... संम्भावना है आदरणीया
को रुचिकर प्रतीत होगा ।

Monday, 8 October 2012

सरकारी कार .....

सरकारी कार .....

सरकार सी कार है,
या कार सी सरकार है।
स्टेरिंग पर बैठा है जो वोह चलाता ही नहीं,
रिमोट कंट्रोल जाने किसके पास हैं ?
कार के टायर नहीं धुरी की बस पुछो नहीं,
कार नहीं डांवाडोल वाहन का प्रकारहै,
कहते हैं जनता का शासन है,शक का कारण नहीं,
पारदर्शिता इतनी की घोटाला भी कोई बचता नहीं,
स्वार्थों का आविष्कार कद नेताओं क्यों घटता नहीं,
खूब अन्धकार है ,बीच धार में कोई रस्ता नहीं,
तन छुपा लो तो भी पेट कभी ढंकता नहीं,
है गंभीर खराबी पर मेकेनिक कोई सुधारता नहीं।
सिर्फ कलर का सोचा  इन्जन मैं लोचा है,
चल रही कैसे कभी किसी ने ये सोचा नही।
महंगा ज़माना पार्टस हैं पुराना,
फिर भी इमानदार यँहा टिकता नहीं।
आज फिर स्टेरिंग पर नए ड्राइवर की दरकार है,
धोखा मत खाना लोगों लालची यह सरकार है,
स्वार्थसिद्दी में लगे इन प्रपंचियों को
उखाड़ फेंकना अब तुम्हारा अधिकार है।
शांति, भाईचारे और समर्थन से संभावना साकार हैं।
जनता के लिए चुन लो मित्रों जनता की ही सरकार है .....
धुरी वाले पहियों से ही संवरता संसार है ,
आशा अभी जीवित है कि अपनी सी कार है।
  ....... प्रदीप यादव स्व-रचित  9 OCT 2012




संध्या सुन्दरी 

Monday, 1 October 2012

राजीनामा

राजीनामा

शर्तें आधी अधूरी,
न तेरे मन की
ना ही मेरी ही पूरी,
मौन मौन शब्दों ने
घोल डाली कडवाहट,
खोल कर रख डाली
सांझी वाली बात।
रंगों के उड़ने से लेकर
पेशानी के पसीने की धार।
पत्थर वाली सिल पर
फूल खिलाने की रार ।
संभल कर बोलते थे
खामोश इशारे,
माने तो ठीक
वर्ना चुप करो प्यारे ।    ....



बंद कमरे की
अनसुनी सी बात
बुलंद हो गूंजी
तो थर्राई
थी इमारत ....

तुमसे करनी थी
सहमी सी
एक फरियाद
बस रास नहीं आई
थी इबारत ....

कोयला कालिख का
पता दे तो रहा था,
मेरे दहकाने भर की देर थी,
अंगार बना आशियाना स्वर्ग सा।
कुछ बातें बेबाक हुई थी
बस यंही से राहें जुदा थीं।
अब के जो राख उडी थी,
सुर्खियों की जगह नमी थी,
देता रहा भरोसा सलामती का जो,
उड़ चुका भाप की तरह कभी का।
पश्चाताप का मुहाना
और विरोध का राग,
जिसका है ठिकाना
उसे था अपनाना ,
अब नहीं होगी जगह
गैरों की तमाशबीनी की
मिल गया साथी जंहा
कर राजीनामा
भूल कर अब मेरे बसेरे
को कभी नज़र तुम लगाना।

......   प्रदीप यादव  ( 20 सितम्बर 2012 )


झूम कर बरसा था तो कहते थे, कि  बादल को सलीका नहीं बरसने का ।
खिली जो धूप बस कुम्हलाकर लगे कहने,भूल तो गया नहीं बरसने का ।।   ....  प्रदीप स्वरचित