Sunday, 14 October 2012

 SSHHEE  ...  ( शी ... )

भेड़ीऐ यंहाँ घूम रहे है सभ्यता की खाल में ,
मददगार बनकर करने आबरू की तिज़रातें।
विद्रूपताएं अनंत है अश्लील भी
अन्यमयस्क सी है मान्यताएँ,
अनीति की उपासिका सुनितियाँ,
फिर विख्यात या प्रसिद्ध कलाकार,
प्रकटे नेता भी अपनी सीमा लांघकर,
मैंने भुगती हैं यहाँ वर्जनाओं की लागत,
कभी माँ की ही कोख में मारी गई तो
कभी आग में दाहने की बाध्यताएं ।
उहापोह में बंदिशों की कर अवमाननाएं,
अब ना और खुद पर ही शरमाएं,
अपनी संतति से ही आँख मिलाएं,
चलो मिलकर सब बेटियाँ बचाएँ ।   ....... प्रदीप यादव ( स्व-रचित 13 OCT 21012 )


रचना लिखने की प्रेरणा आदरणीया मंजू शरण की रचना जो खाप पंचायतों तथा उन जैसे ही संगठनों
के संस्कृति रक्षण के  नाम हमारे  समाज की लगभग  आधी जनसंख्या के बारे में,  आजकल लगभग
अप्रचलित हो चुकी मान्यताओं का समर्थन करते आ रहे नीति नियंताओं पर कुठाराघात करती है से
मिली। "वर्जना की वनिता" यह नाम दिया है मंजू शरण जी के कवित्त को .... संम्भावना है आदरणीया
को रुचिकर प्रतीत होगा ।

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