Monday, 29 October 2012

बुढा गया हूँ .....(new year )

आने वाले साल का स्वागत और आप सभी की सम्रद्धि की कामना करते हुए ....
साल का अवसान पर नए और तरंगित साल की ही कल्पना है आप ने जाने वाले साल में
जो भी उपलब्धियां प्राप्त कीं उस हेतु बधाई, अब नए साल की बेला पर पुराने बुढाए साल
की ऊर्जा और स्वयं की असमर्थता प्रकट करती रचना आपके सम्मुख प्रस्तुत है ......


बुढा गया हूँ .....

हांफ कर थक गया हूँ,
मैं थोडा सा गलने लगा हूँ,
वोह जो धुआं सा छाने लगा है,
आइना धुंधलाने लगा है ,
क्या देखूँगा चेहरा वक्त
'बेवक्त'सताने लगा है।
कितने बेतकल्लुफ होते हैं,
आईने भी जो शफ्फाक
दिखा रहे है काज़ल को भी,
मेरी तो इनसे कोई दुश्मनी,
भी ना थी जाने क्यों चेहरे
पर लकीरें अनगिनत उकेर दीं,
सोचा था अभी तोह जी भर,
की है जो मेहनत
मज़ा उसका तो लूं।
मेरे शाने को ताकीद कर दी,
बस नियत भार ढ़ोने की,
नियामक कई लाद
दिए मेरी खुराक पर,
गुजिश्ता चंद लम्हात मे,
उम्र दीख गयी कमर पर,
मैं आइनों को कोसने लगा हूँ ,
शायद असमय बुढ़ाने लगा हूँ।
वर्ना मेरी ही सीख से आईने
साफगोई का इल्म पा रहे थे,
वो तोह सच ही बयाँ करते,हम ही
सामना करने से कतरा रहे थे । ....    प्रदीप यादव (स्व-रचित ) 30 OCT 2012

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