राजीनामा
शर्तें आधी अधूरी,
न तेरे मन की
ना ही मेरी ही पूरी,
मौन मौन शब्दों ने
घोल डाली कडवाहट,
खोल कर रख डाली
सांझी वाली बात।
रंगों के उड़ने से लेकर
पेशानी के पसीने की धार।
पत्थर वाली सिल पर
फूल खिलाने की रार ।
संभल कर बोलते थे
खामोश इशारे,
माने तो ठीक
वर्ना चुप करो प्यारे । ....

बंद कमरे की
अनसुनी सी बात
बुलंद हो गूंजी
तो थर्राई
थी इमारत ....
तुमसे करनी थी
सहमी सी
एक फरियाद
बस रास नहीं आई
थी इबारत ....
कोयला कालिख का
पता दे तो रहा था,
मेरे दहकाने भर की देर थी,
अंगार बना आशियाना स्वर्ग सा।
कुछ बातें बेबाक हुई थी
बस यंही से राहें जुदा थीं।
अब के जो राख उडी थी,
सुर्खियों की जगह नमी थी,
देता रहा भरोसा सलामती का जो,
उड़ चुका भाप की तरह कभी का।
पश्चाताप का मुहाना
और विरोध का राग,
जिसका है ठिकाना
उसे था अपनाना ,
अब नहीं होगी जगह
गैरों की तमाशबीनी की
मिल गया साथी जंहा
कर राजीनामा
भूल कर अब मेरे बसेरे
को कभी नज़र तुम लगाना।
...... प्रदीप यादव ( 20 सितम्बर 2012 )
झूम कर बरसा था तो कहते थे, कि बादल को सलीका नहीं बरसने का ।
खिली जो धूप बस कुम्हलाकर लगे कहने,भूल तो गया नहीं बरसने का ।। .... प्रदीप स्वरचित
शर्तें आधी अधूरी,
न तेरे मन की
ना ही मेरी ही पूरी,
मौन मौन शब्दों ने
घोल डाली कडवाहट,
खोल कर रख डाली
सांझी वाली बात।
रंगों के उड़ने से लेकर
पेशानी के पसीने की धार।
पत्थर वाली सिल पर
फूल खिलाने की रार ।
संभल कर बोलते थे
खामोश इशारे,
माने तो ठीक
वर्ना चुप करो प्यारे । ....

बंद कमरे की
अनसुनी सी बात
बुलंद हो गूंजी
तो थर्राई
थी इमारत ....
तुमसे करनी थी
सहमी सी
एक फरियाद
बस रास नहीं आई
थी इबारत ....
कोयला कालिख का
पता दे तो रहा था,
मेरे दहकाने भर की देर थी,
अंगार बना आशियाना स्वर्ग सा।
कुछ बातें बेबाक हुई थी
बस यंही से राहें जुदा थीं।
अब के जो राख उडी थी,
सुर्खियों की जगह नमी थी,
देता रहा भरोसा सलामती का जो,
उड़ चुका भाप की तरह कभी का।
पश्चाताप का मुहाना
और विरोध का राग,
जिसका है ठिकाना
उसे था अपनाना ,
अब नहीं होगी जगह
गैरों की तमाशबीनी की
मिल गया साथी जंहा
कर राजीनामा
भूल कर अब मेरे बसेरे
को कभी नज़र तुम लगाना।
...... प्रदीप यादव ( 20 सितम्बर 2012 )
झूम कर बरसा था तो कहते थे, कि बादल को सलीका नहीं बरसने का ।
खिली जो धूप बस कुम्हलाकर लगे कहने,भूल तो गया नहीं बरसने का ।। .... प्रदीप स्वरचित
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