विश्वास की मंगल कामना ....
मंद पड़ रहे चमकीले नयन कैसे दिखलाऊँ ,
दरियाफ्त के इरादे किस तरह समझाऊँ ,
सचमुच ही हालात के द्वार पर
झंझावात से लड़ा हूँ ?
सुबकियां नहीं थी ना ही रुदन,
फैसलों की ठोकरों को सह रहा हूँ ?
ना पर्वों का उल्लास था,
भटक जाने का अहसास था।
सूखा बादल था ठंडे मेह को तरसा हूँ।
खोलकर डब्बे को यादों को भरता हूँ।
महती आवश्यकता, निर्मूल समझता हूँ।
मंगल कामना करता हूँ ?
मैं जतन पहाड़ तोड़ने के करता हूँ ?
गिर गिर कर उठता रहा हूँ,
तब कंही जाकर पैरों पर खड़ा हूँ ?
अब नहीं छोडूंगा ज़िन्दगी का दामन,
प्रीत का वादा निभाने चला हूँ ?
रंग रीती को रंगरेज़ का पता,
बताने चल पडा हूँ।
जिद को डुबाने चल पडा हूँ।
राहों में फूलों की मुंडेर सजाने लग पडा हूँ ।
अधूरे मनमंदिर की मूरत को फिर गढ़ने लगा हूँ ?
फिर से एक बार निखर कर संवरने लगा हूँ।
...........प्रदीप यादव 2 OCT 2012
चलो 'मन' को मना लेते हैं ...
बिखरे मनके 'मन' के सहेज लो,
सजा भूलों की कम करो ना करो,
बूँद बूँद अश्रु पर खारे हुए शब्द को,
फिर निःशब्द पिरो लेते हैं,.....
गुंथकर माला शुरुआत नई करते हैं।
चलो 'मन' को मना लेते हैं ...
.....प्रदीप यादव स्व-रचित 13 OCT 2013
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