बर्फ का बीज
BY .........प्रदीप यादव
बर्फ का बीज हूँ ,घिर गया गर्म हवाओं की आगोश में ,
जिस पर रेल रहा हूँ वो एक बर्फ की शिला प्रस्तर,
पहाड़ के अंतस पर निर्झर रिस रहा था सोता बनकर ,
लड़ लड़ कर पसरा हूँ निःशब्द अँधेरी गुफाओं के द्वार,
उस सांस से आ रही थी रोशनी की खबर भी छनकर,
दिल मंजूर करता ना था फिर भी ले ही ली टक्कर,
हौसले मंद, रूह को भी आजमा लूं धड़कनें गिनकर,
तांडव कर भैरवी गाऊँ, खरज लगाऊँ नया राग छेड़कर,
बन गया दरिया बिगडैल दरख़्तों को संग बहाकर,
सख्त चट्टानी केनवास को आसान कूचियों सा रंगकर,
मिली जो नदी एक मोड़ पर घुल गया था उसी में समाकर,
मंद मंद बहूँ , कभी शांत झील सा पाकर विस्तार,
गगन के लाखों अक्स मेरी सतह पर मिटते चमककर,
किनारों सटे हरे भरे जीवन रंग सजे जल-थल और नभचर,
गूंजते घडियाल, खुशियाँ सजती पर्वों का जशन लेकर,
देख ली मौत की चीत्कार भी मुक्त हो इहलोक भोगकर,
समझा हूँ देर सवेर इशारे जीने के इस जिंदगी से मिलकर,
गंदला मैलापन बहाया चट्टानी हसरतों को कर जर्जर,
शिकवा नहीं कोई, जीभर के जिया हूँ अब सो रहूँगा,
किसी खारे समंदर की आगोश मे दफ़न होकर .......।
है इंतज़ार किसी रोज सूरज को आया जो रहम मुझपर,
पुनः भाप बन कर जा मिलूँगा बादलों से कर हवाई सफ़र,
छूट रज किनारों की कैद से मिलूंगा बनकर 'बर्फ का बीज'।
By ~प्रदीप यादव ~
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