Friday, 23 November 2012

जिक्र छिड ही जाता था तेरे आने का ...

भीगती रातों की तन्हाई
यूँ ही काट लेता हूँ ।
आवाज देकर सहर को
फिर करीब बुलाता हूँ ।
तौबा करके रिवाजों से फिर
उल्फत में पड़ जाता हूँ।
नसीब मेरे कोई नवाबी
ठाठ गढ़ने के रहे होंगे ,
तभी तो तकदीर से ज्यादा
दर्द,सहने की इमदाद पाता हूँ ।
वक्त मुझ पर रहम कर
देर तक परेशान नही करता,
बेचारा किस्मत के हवाले कर मुझे,
बस आगे बढ़ जाता है।
मैं ही गाहे बगाहे उनकी नज़रों
से तकरीरें किया करता हूँ,
मुझे शक है हाज़िर जवाब नजरों
को बहाने अब भी याद कई होंगे।
फूल कल ये भी तो  पुराने  होंगे,
खुशबू-ओ-रंगत से बेगाने होंगे। 
दोस्ती में हासिल अहसास भी
जाने पहचाने होंगे,
मेरे जेहन के बागीचे में खयालों
के नजराने होंगे।         ............ प्रदीप यादव (स्व-रचित) 27/10/2012







No comments:

Post a Comment