ताजुल मकबरा
यमुना के तीर घायल पडा हूँ।
मेरे चाहने वाले महल हैं कहते,
फिलवक्त, फक्त एक मक़बरा हूँ
मर्सिया पढ़ लेने की,
फुरसत निकाल कर मेरे
शफ़्फ़ाक़ मरमरी सिरहाने,
सोए शाह ए जंहाँ ओ मुमताज के
जानिब मेरे शापित भरम को
जानने वाले मोहोब्बत के
इदारों को उड़ान भरते देख,
कहते की अगरचे वो मुहब्बत,
ही इमानदार होती तो,
किसी बेकल से परिवार
की बेवजह यूँ ना मौत होती।
पेट की आग बुझाने की हसरत में
चाक होते वक्त
कटे हाथों से भेजी बददुआ से
हुनर बाज हैं गिद्ध ओ बाज,
जो अब तलक हैं मिटा रहे,
इस जंहा से गंद का खाज ।
~प्रदीप यादव
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