Monday, 21 January 2013

बंदिश



बंदिश
एक फकीर की ...


By .... प्रदीप यादव ( स्व-रचित 10जनवरी 2013 )

रहमत कहै मंतर में है शिफा,
तू कितनी भी इबादत कर ले,

फिर पूछना फकीरों के दामन खाली रखने वाले,
औकातों को फर्श दिखाने का दमखम क्यों दिया,

बसा के मेरी आरजू में इस दफा,
लुटा हुआ सा, जंहाँ ही क्यूँ दिया।

औलिया ही बनाकर दुनिया को मुरीद जो बनाना था,
इतना खाली किया कि दानिशमंद  फकीर बना दिया।

किया हो जो करम तूने मैंने तो भुला दिया,
तू ही नसीबों का है तराजू बाद याद आया।

मैंने कभी बड़ी बात कही पर तूमने उसे अंजाम दिया,
रहीम ने मेरे मयार' को बढ़ाकर आसमान कर दिया।

भुला हूँ, किसी वक्फे तो मौला रहम,
तेरे होने से मेरी बरकत रही न कम।

सादगियाँ लूटतीं सरमाया, शर्मिन्दा शातिर होता रहता।
दीवानों की  होती मौजां बिन मांगे रब का साबका रहता।

~ प्रदीप यादव ~


 इबादत की इबारात हो जिसके नज़ीर ,
मुर्शिदों की आमद पर हैं झुकते वजीर । 
हालिया हसरत पर खुदा नज़र रखते हैं,
किसी बहाने कुरआन जो थाम लेते हैं ।

 ~ प्रदीप यादव ~


बंदिश          -       सीमाएं, लिमीटेशन

शिफा          -       वरदान, आरोग्य, हीलिंग पॉवर
औकात        -       सामाजिक स्तर, वकार, सोशल स्टेचर
आरजू          -      अभीष्ट, इच्छाएं, लाईकिंग
दफा            -       बार, टाईम्स
औलिया      -       यक्ष, देवदूत, एजल
मुरीद          -        प्रशंसक, फेन
दानिशमंद    -        बुद्धिजीवी, इंटलेक्चुअल
दरवेश         -        देवदूत, एंजेल
करम          -        वरदान,कृपा, ब्लेसिंग
तराजू         -         तौल करने वाला, स्केल ऑर बेलेंस 
मयार         -         स्तर, पद, पोजीशन
वक्फे          -        अल्प समयावधि, क्षणों में, निक ऑफ़ टाइम
सरमाया      -        संपत्ति, धनदौलत, वेल्थ 
साबका        -        सामना, दर्शन, फेसिंग


       

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