Wednesday, 30 January 2013

बावास्ता अब तक क्यों है ...?

बावास्ता अब तक क्यों है ...?

देहरी पर फिर सर रखकर यूँ सोया करता क्यों हैं ?
आस छूटती नही 
ये तेरी, तलब कामयाब क्यों हैं ?

जीने के
नही रहे यहाँ हालात फिर जिन्दा क्यों हैं ?
भूल जा अब की शुबहा
होगा आवाज़ देता क्यों हैं ?

लड़ा मैं जिसकी खातिर शामिल वो मुद्दा क्यों हैं ?
आगाज़ जमाने के समझते तो परेशानी क्यों है ?



ख्यालों में तो ख्वाब में बन सवाली डराता क्यों है ?
खतावार थे, अगर दीदार तेवरों के कराता क्यों है ?

तेरे कहने के बावजूद यंहाँ मुकाबला सा क्यों हैं ? 

 कल था साथी आजकल खिंचाखींचा सा क्यों है ?

रुबाइ भरी नज़में
सुनाकर फिर रुलाता क्यों हैं ?
है
शर्मसार खुद पर तो करता समझौता क्यों है ?


रोज नई बातों पे मेरे यार हसरतें बढाता क्यों हैं ?
आहट के भरोसे ख्वाहिशों को फुसलाता क्यों हैं ?


~
प्रदीप यादव ~

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