बावास्ता अब तक क्यों है ...?
देहरी पर फिर सर रखकर यूँ सोया करता क्यों हैं ?
आस छूटती नही ये तेरी, तलब कामयाब क्यों हैं ?
जीने के नही रहे यहाँ हालात फिर जिन्दा क्यों हैं ?
भूल जा अब की शुबहा होगा आवाज़ देता क्यों हैं ?
लड़ा मैं जिसकी खातिर शामिल वो मुद्दा क्यों हैं ?
आगाज़ जमाने के समझते तो परेशानी क्यों है ?
ख्यालों में तो ख्वाब में बन सवाली डराता क्यों है ?
खतावार थे, अगर दीदार तेवरों के कराता क्यों है ?
तेरे कहने के बावजूद यंहाँ मुकाबला सा क्यों हैं ?
कल था साथी आजकल खिंचाखींचा सा क्यों है ?
रुबाइ भरी नज़में सुनाकर फिर रुलाता क्यों हैं ?
है शर्मसार खुद पर तो करता समझौता क्यों है ?
रोज नई बातों पे मेरे यार हसरतें बढाता क्यों हैं ?
आहट के भरोसे ख्वाहिशों को फुसलाता क्यों हैं ?
~ प्रदीप यादव ~
देहरी पर फिर सर रखकर यूँ सोया करता क्यों हैं ?
आस छूटती नही ये तेरी, तलब कामयाब क्यों हैं ?
जीने के नही रहे यहाँ हालात फिर जिन्दा क्यों हैं ?
भूल जा अब की शुबहा होगा आवाज़ देता क्यों हैं ?
लड़ा मैं जिसकी खातिर शामिल वो मुद्दा क्यों हैं ?
आगाज़ जमाने के समझते तो परेशानी क्यों है ?
ख्यालों में तो ख्वाब में बन सवाली डराता क्यों है ?
खतावार थे, अगर दीदार तेवरों के कराता क्यों है ?
तेरे कहने के बावजूद यंहाँ मुकाबला सा क्यों हैं ?
कल था साथी आजकल खिंचाखींचा सा क्यों है ?
रुबाइ भरी नज़में सुनाकर फिर रुलाता क्यों हैं ?
है शर्मसार खुद पर तो करता समझौता क्यों है ?
रोज नई बातों पे मेरे यार हसरतें बढाता क्यों हैं ?
आहट के भरोसे ख्वाहिशों को फुसलाता क्यों हैं ?
~ प्रदीप यादव ~
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