Thursday, 24 January 2013

अटपटी मोड़ी

अटपटी मोड़ी 

हरी हुई है क्या,
कभी सुनती नहीं तू
ज़माने ने टाला हैं,
बरसों ज़नाना सवालों को,
एक तू ही लमतडंग बेल सी
पैदल ही,बढ़ रही है ,
आसमान नया अपनाने को,
कहे देती हूँ मेरे आसपास
भाइयों का पहरा तो था,
कमी नहीं थी पड़ोस का
भरोसा गहरा जो था,
मैं सफल थी या नहीं,
ये भी मेरी माँ का
रूख ही तय करता था,
सफलताओं का चेहरा,
हमारी आशाएँ अगर
हर नए साल पर बढ़ती है,तो
कोई भी चेहरा यहाँ मुझ सा होगा,
लेकिन मैं नहीं,
दोस्त मान कर
बस सलाह तू , गांठ बांध  मेरी
समझ ले अब कहा,
अभी भी जान ले वक़्त है,
इन चारदिवारी के बाहर,
जो भी कुछ चल रहा हैं,
खतरनाक है, खौफनाक है और जहरीला है।

~ प्रदीप यादव (स्वरचित)~

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