हाहाकार !!!
प्रदीप यादव की स्वरचित रचनाएँ...
Tuesday, 26 November 2013
शोले की तड़प
शोले की तड़प
अंदाज़ों को परखा है हमने :
हुजुर !थोड़ा कम सही ; पर...
ये ज़माना देखा है हमने ...|
ऐ आग !
बढ़ने की हद क्या होती है ....
ज़रा किसी दिन चिंगारी से सुन !!!
~
प्रदीप यादव
~
1 comment:
Kailash Sharma
26 November 2013 at 06:40
बहुत खूब!
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