Monday, 2 December 2013

हरजाई मुस्तकबिल ...



हरजाई मुस्तकबिल  ...
 By ~ प्रदीप यादव ~

ये किस्सागोई के दश्त में एक बार तोह पूछ बैठूँगा ;

ऐ बनाने वाले बता खुशनसीबी कैद की इबारतें हैं क्यों ?


कि सोते हुए मजलूमों को ख्वाब दिखाने वाले बता ;

ताबीरों के मुकम्मल होते ही हौसलों को गिराता है क्यों ?


हम ख़ाकनशीं हैं गुबार ओ गर्द भरी राह के कारवां में ;

तू इम्तियाज़ सातों आसमानों का फिर आजमाता है क्यों ?  
प्रदीप यादव ~

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