हरजाई मुस्तकबिल ...
By ~ प्रदीप यादव ~
ये किस्सागोई के दश्त में एक बार तोह पूछ बैठूँगा ;
ऐ बनाने वाले बता खुशनसीबी कैद की इबारतें हैं क्यों ?
कि सोते हुए मजलूमों को ख्वाब दिखाने वाले बता ;
ताबीरों के मुकम्मल होते ही हौसलों को गिराता है क्यों ?
हम ख़ाकनशीं हैं गुबार ओ गर्द भरी राह के कारवां में ;
तू इम्तियाज़ सातों आसमानों का फिर आजमाता है क्यों ?
~ प्रदीप यादव ~
No comments:
Post a Comment