Friday, 13 December 2013

जूठन


विष का पान हैं जूठन ,
गिरता इंसान है जूठन , 
लुटता सम्मान है जुठन ,
अतृप्त श्रंगार है जूठन ,
कामयाब बेईमान है जुठन ,
अमर्यादित अभिमान जूठन ,
साहस का अपमान जूठन ,
अपच का काम है जूठन , 
अन्नदेव का अपमान है जूठन | 


प्रदीप यादव ~ 

Thursday, 12 December 2013

निरापद राजा


निरापद राजा 

वाक्य रचूं ,
या करूँ वाकये की
 रचना,
संभव करूँ,
अभिरंजना की संभावना |

सोच रखूं या प्रगटूं शोक ,
रस रखूँ नीचोड़ कर
नीरस कर दूं |
याचक हो प्रवासी मेधाओं से
स्वशिक्षित कहलवाऊँ । 

साहित्य सर्जना का
अपमार्जक बन बैठूँ |
सूट हुआ तोह ठीक;
परसूँ उतारा जाऊं ।
भाट ही बनुँगा ,
अंगीकार करुं दुत्कार,
पर चाटुकार नहीं बन पा रहा।

उत्कर्ष को आधार कहने वाले से
मेरी पटरी कम ही बैठती है ।
अरे ! निर्वासित की खोज में,
शक्ति कम पर युक्ति
तोह लगती हैं ।
राज कर्म करने में
भक्ति का राजभोग
भी चढ़ाना है ।
पुरुस्कार प्रतिनिधि से
नामित होने में
फिर प्रतिष्ठित विष्टा
का आचमन करुं ।
 
प्रदीप यादव ~

___________________________________________


प्रादुर्भाव " प " से का

By ~ प्रदीप यादव ~ 


प ' का अनुकरण पाठ ,

प ' से पाठक की पड़ताल ; 
प ' से प्रस्तोता का मंथन ,
प ' से पार्थ कुरुक्षेत्र का ,
प ' से प्रस्तुति देती ,
प ' प्रतीकात्मक प्रतीति ,
प ' से पद्य पद, पदेन अनेन ,  
प ' का चिंतन एक पारस छूता मर्म |
प ' से  पारितोषिक पा रहे पुरुषार्थी |


प्रदीप यादव ~


________________________________________



Monday, 9 December 2013








________________




यूँ आसान होता हकेलना भीतर, 
जहर को कलमकशी के लिए ; 
हर जवाब अमृत होता आदम के, 
जी लेने की आशिकी के लिए |
 प्रदीप यादव ~

फर्क | Farq


  
 Farq

_______


   फर्क 



दिखाई देता है, देखने 

और दिख जाने की जिद से ,
मिलता है मिलते रहने से
बार-बार किसी एक से ,
मस्तियों के पलों में
टेढ़े रास्तों की पहचानों में भी ,
काली बदलियों से बरसती
फुहार के भीगोने में भी ,
जिंदगी की पटरी की ,
राहों के थमे छुट्टे लम्हों में ,
फर्क तोह दिखता है ... |


इतराते नकाबों से बाहर

आ कर निगाहें मिलाने से ,
कशिश के बढ़ते इरादों से
डरते कांपते उन वादों में ,
बहक कर भूलती कड़ीयों
के यूँ फिर आस जगाने से ,
बिसराईं भूली यादों पर छाई
गुबार को झटकारने से, 
फर्क तोह दिखता है ... | 


टूटती उम्मिदों पर ढूलके

आंसू छुपाने की कोशीशों से ,
रंगों के खुशमिजाज मौसम में 
छाप ए बेनूरी दबाने से,
दिल अज़ीज़ से मुलाक़ात के
दरमयां फासले बढ़ने से, 
चंद क़दमों में बिछुड़ कर
मंजिलें अधूरी अंजाम देने से , 
फर्क तोह दिखता है ... |


नाहक मतलों में बेईमान

जिन्दगी खोज निकालने से,
बेसबर दिलों की उमड़ती
ख्वाहिश के वरफ नए पढने से,
हों मुश्किल फिर ये हालात 
बिगड़ी बात फिर संवारने से , 
गरज लेने से होती है हासिल
गर बरसात तोह बरसने से ,
फर्क तोह दिखता है ... | 



~ प्रदीप यादव ~

Friday, 6 December 2013

" गधे की शादी "


" गधे की शादी " 

मनचला हो गया हूँ मैं भी आजकल ,
वर्ना सीरियस रहो तोह लोग मुझे भी
सुरेन्द चतुर्वेदी (प्रसिद्ध हिंदी हास्य कवि )
समझने लगे थे |
कहने लगे अपना ये "प्रदीप" बड़ा सिरफिरा है
बड़ी बड़ी बातें करता
है और पक कर खुदी सो ले ता है | 

अब मैंने भी ठान लिया है कि एक काम करो 
प्रदीप बाबू अपनी ही मंडली में से एक को चुनो
उसे इतना हंसाओ की बेचारा खुद को
कामेडी नाइट्स का जज  समझने लगे |
इसमें उसका भी भला और मेरा भी ...!
चलो तोह मैंने भी अशोक चक्रधर जी की
फोटो को ध्यान पूर्वक देखा पर मुझे उनसे
कोई ऊर्जा ही नहीं मिली मैंने तुरंत सोच लिया
" बीडू अगर ये महाशय थोबड़े पे चश्मा गड़ाकर
गंभीर हास्य रच सकते हैं तोह हमें तोह लोग वैसे
ही सीरियसली नहीं लेते ...
और तक्षण हमें ज्ञान हुआ 

कि अपनी छुपी हुई प्रतिभाएं तोह हम व्यर्थ गंवा रहे थे ,
और ये फेसबुक मित्र जाने क्या क्या अर्थ लगा रहे थे |

हमने तुरंत अपने पड़ोसी अरोरा जी को जा के पकड़ा ,
और कर दी फरमाइश ,
फ्रेश और ताजी कविता 
सुन लेने की ,

शीर्षक सुनते ही उनका माथा ठनका,

पड़ोसी बोले  यादव जी हद करते हो |
अरे " गधे की शादी " शीर्षक से भी
कोई कविता लिखता है भला |


हमने कहा मान भी जाओ अभी लिखी है;
सुनते तोह जाओ | 
प्राजी, नया नया प्रयास है,
आप भी हो जाओ राजी |

नहीं माने ... मानने को तैयार ही नहीं थे बोले
पेले इस गधे को रिप्लेस कराओ फिर आगे
की सुनाओ |

मन ही मन फिर मैंने भी सोचा प्राजी को कौन
समझाए ,
नए निराले चलन हैं ,नई ये आबादी;
अरे आज कल सिर्फ "गधे ही तोह करते हैं शादी " |

~ प्रदीप यादव ~ 

Monday, 2 December 2013

हरजाई मुस्तकबिल ...



हरजाई मुस्तकबिल  ...
 By ~ प्रदीप यादव ~

ये किस्सागोई के दश्त में एक बार तोह पूछ बैठूँगा ;

ऐ बनाने वाले बता खुशनसीबी कैद की इबारतें हैं क्यों ?


कि सोते हुए मजलूमों को ख्वाब दिखाने वाले बता ;

ताबीरों के मुकम्मल होते ही हौसलों को गिराता है क्यों ?


हम ख़ाकनशीं हैं गुबार ओ गर्द भरी राह के कारवां में ;

तू इम्तियाज़ सातों आसमानों का फिर आजमाता है क्यों ?  
प्रदीप यादव ~