Thursday, 12 December 2013

निरापद राजा


निरापद राजा 

वाक्य रचूं ,
या करूँ वाकये की
 रचना,
संभव करूँ,
अभिरंजना की संभावना |

सोच रखूं या प्रगटूं शोक ,
रस रखूँ नीचोड़ कर
नीरस कर दूं |
याचक हो प्रवासी मेधाओं से
स्वशिक्षित कहलवाऊँ । 

साहित्य सर्जना का
अपमार्जक बन बैठूँ |
सूट हुआ तोह ठीक;
परसूँ उतारा जाऊं ।
भाट ही बनुँगा ,
अंगीकार करुं दुत्कार,
पर चाटुकार नहीं बन पा रहा।

उत्कर्ष को आधार कहने वाले से
मेरी पटरी कम ही बैठती है ।
अरे ! निर्वासित की खोज में,
शक्ति कम पर युक्ति
तोह लगती हैं ।
राज कर्म करने में
भक्ति का राजभोग
भी चढ़ाना है ।
पुरुस्कार प्रतिनिधि से
नामित होने में
फिर प्रतिष्ठित विष्टा
का आचमन करुं ।
 
प्रदीप यादव ~

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प्रादुर्भाव " प " से का

By ~ प्रदीप यादव ~ 


प ' का अनुकरण पाठ ,

प ' से पाठक की पड़ताल ; 
प ' से प्रस्तोता का मंथन ,
प ' से पार्थ कुरुक्षेत्र का ,
प ' से प्रस्तुति देती ,
प ' प्रतीकात्मक प्रतीति ,
प ' से पद्य पद, पदेन अनेन ,  
प ' का चिंतन एक पारस छूता मर्म |
प ' से  पारितोषिक पा रहे पुरुषार्थी |


प्रदीप यादव ~


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