हाहाकार !!!
प्रदीप यादव की स्वरचित रचनाएँ...
Monday, 9 December 2013
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यूँ आसान होता हकेलना भीतर,
जहर को कलमकशी के लिए ;
हर जवाब अमृत होता आदम के,
जी लेने की आशिकी के लिए |
~
प्रदीप यादव
~
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