Monday, 9 December 2013

फर्क | Farq


  
 Farq

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   फर्क 



दिखाई देता है, देखने 

और दिख जाने की जिद से ,
मिलता है मिलते रहने से
बार-बार किसी एक से ,
मस्तियों के पलों में
टेढ़े रास्तों की पहचानों में भी ,
काली बदलियों से बरसती
फुहार के भीगोने में भी ,
जिंदगी की पटरी की ,
राहों के थमे छुट्टे लम्हों में ,
फर्क तोह दिखता है ... |


इतराते नकाबों से बाहर

आ कर निगाहें मिलाने से ,
कशिश के बढ़ते इरादों से
डरते कांपते उन वादों में ,
बहक कर भूलती कड़ीयों
के यूँ फिर आस जगाने से ,
बिसराईं भूली यादों पर छाई
गुबार को झटकारने से, 
फर्क तोह दिखता है ... | 


टूटती उम्मिदों पर ढूलके

आंसू छुपाने की कोशीशों से ,
रंगों के खुशमिजाज मौसम में 
छाप ए बेनूरी दबाने से,
दिल अज़ीज़ से मुलाक़ात के
दरमयां फासले बढ़ने से, 
चंद क़दमों में बिछुड़ कर
मंजिलें अधूरी अंजाम देने से , 
फर्क तोह दिखता है ... |


नाहक मतलों में बेईमान

जिन्दगी खोज निकालने से,
बेसबर दिलों की उमड़ती
ख्वाहिश के वरफ नए पढने से,
हों मुश्किल फिर ये हालात 
बिगड़ी बात फिर संवारने से , 
गरज लेने से होती है हासिल
गर बरसात तोह बरसने से ,
फर्क तोह दिखता है ... | 



~ प्रदीप यादव ~

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