Friday, 6 December 2013

" गधे की शादी "


" गधे की शादी " 

मनचला हो गया हूँ मैं भी आजकल ,
वर्ना सीरियस रहो तोह लोग मुझे भी
सुरेन्द चतुर्वेदी (प्रसिद्ध हिंदी हास्य कवि )
समझने लगे थे |
कहने लगे अपना ये "प्रदीप" बड़ा सिरफिरा है
बड़ी बड़ी बातें करता
है और पक कर खुदी सो ले ता है | 

अब मैंने भी ठान लिया है कि एक काम करो 
प्रदीप बाबू अपनी ही मंडली में से एक को चुनो
उसे इतना हंसाओ की बेचारा खुद को
कामेडी नाइट्स का जज  समझने लगे |
इसमें उसका भी भला और मेरा भी ...!
चलो तोह मैंने भी अशोक चक्रधर जी की
फोटो को ध्यान पूर्वक देखा पर मुझे उनसे
कोई ऊर्जा ही नहीं मिली मैंने तुरंत सोच लिया
" बीडू अगर ये महाशय थोबड़े पे चश्मा गड़ाकर
गंभीर हास्य रच सकते हैं तोह हमें तोह लोग वैसे
ही सीरियसली नहीं लेते ...
और तक्षण हमें ज्ञान हुआ 

कि अपनी छुपी हुई प्रतिभाएं तोह हम व्यर्थ गंवा रहे थे ,
और ये फेसबुक मित्र जाने क्या क्या अर्थ लगा रहे थे |

हमने तुरंत अपने पड़ोसी अरोरा जी को जा के पकड़ा ,
और कर दी फरमाइश ,
फ्रेश और ताजी कविता 
सुन लेने की ,

शीर्षक सुनते ही उनका माथा ठनका,

पड़ोसी बोले  यादव जी हद करते हो |
अरे " गधे की शादी " शीर्षक से भी
कोई कविता लिखता है भला |


हमने कहा मान भी जाओ अभी लिखी है;
सुनते तोह जाओ | 
प्राजी, नया नया प्रयास है,
आप भी हो जाओ राजी |

नहीं माने ... मानने को तैयार ही नहीं थे बोले
पेले इस गधे को रिप्लेस कराओ फिर आगे
की सुनाओ |

मन ही मन फिर मैंने भी सोचा प्राजी को कौन
समझाए ,
नए निराले चलन हैं ,नई ये आबादी;
अरे आज कल सिर्फ "गधे ही तोह करते हैं शादी " |

~ प्रदीप यादव ~ 

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