Friday, 30 November 2012

दिल लाग्यो रे...मन हारयो रे पिया S S ( गीत )

दिल लाग्यो रे...मन हारयो रे पिया S S ( गीत )

आंखन बस गयो रे एसो छबीलो,रे पीया S S
प्रेम मूरत  सों है एस्सों गर्विलो, रे पीया S S
गलियंन बूझ्यो रे मोरो सांवरो, रे पीया S S
दिल लाग्यो रे ... मन हारयो रे पीया S S ....।

मन  बसिया की छवि मोरी इन आँखन  बसी,
निहारत रहूँ ठगी-ठगी  रूप  चंचल  सी खड़ी,
साज सिंगार भाए न मोहे नजरिया ऐसी जड़ी,
आहट पर लजाऊं री, मीतमिलन की  है घड़ी,
रोको ना, सखी री गली मैं पीया की चल पड़ी,

थिरकत  कदम नहीं  हैं बस में,
कित जाऊं, मधुर मुरली सुनने,
बुनने लागे ये नैन अधूरे  सपने,
श्याम संग डोलूं रास नए रचने,

कि छम छम नाचो रे रंग रंगीलो रे पीया S S
अब नाही थाक्यो रे डमक डम ढफली बजालो रे पीया S S
दिल लाग्यो रे...मन हारयो रे पिया S S
..... ( गीत .....By ... प्रदीप यादव )  1 DEC 2012 ....

मनुहार का मुक्तक


मनुहार का मुक्तक

हवाले से, पहले स्पर्श को महसूस करने का,
मजा हरकतों पर शरारती नजर रखने का,
भीगती रातों को इत्मिनान से संजोने का,
इंतज़ार को हर धड़कन पर भटकाने का,
मिलकर हाल पूछने से पहले नज़रें चुराने का,
वक़्त होता है, मंज़र होता है, शऊर होता है |      

~प्रदीप यादव~

Sunday, 25 November 2012

न्यौछावर ( अर्पण )

 न्यौछावर ( अर्पण ) 

अखबारों की खबरों का आता रहेगा रेला,
चौंसठवें गणतंत्र का सिहांसन ऐसे डोला,
कोई बागड़ ही खाए जा रहा, ताल्लुकात
भेड़ीयों से बताकर 'सिंह' को है, डरा रहा,
जात पांत ने फिर क्यों भर दिया है हाला,
मूर्छा हालत में तेरी थी ये भग्न रंगशाला,
कोई हिन्दी तमिल  का मसला  बता रहा,
ईशनिंदा कर डरने वाले तोड़ रहे शिवाला,
मुहाफ़िज़ ही खाते रहा छीन कर निवाला,
प्रवचन देने वाले अरबपति का भरा थैला,
बातों का हश्र देखा है नींद की लंबी बेला,
अमृत छके को इस देश में कैसा झमेला,
हर बैसाखी अन्न दिया सीमा डाले पहरा,
विश्वास कई डोल चुके आँगन बता मैला,
खेला अनुसंधान कर हथियारों का खेला,
राजा बन रहे, बुराइयों के कोढ़ को फैला,
कद्दावर क्यों भाग रहे बनकर यहाँ लैला,
आवाज़ के साथ चलो बढ़ाओ हाथ मिला,
वक़्त को दिखाओ ज़रा जोशे जूनून की सरगोशियाँ
बढ़े चलो की लुटेरे नकाब ओढ़ कर रहे गुस्ताखियाँ,
इश्क में मादरे- वतन तेरे मिसाल कायम कर चला,
जोश तेरी शहादत का देख आज संदेश परवान चढ़ा |

~.प्रदीप यादव ~

बर्फ का बीज



बर्फ का बीज

BY .........प्रदीप यादव
र्फ का बीज हूँ ,घिर गया गर्म हवाओं की आगोश में ,
जिस पर रेल रहा हूँ वो एक बर्फ की शिला प्रस्तर,
पहाड़ के अंतस पर निर्झर रिस रहा था सोता बनकर ,
लड़ लड़ कर पसरा हूँ निःशब्द अँधेरी गुफाओं के द्वार,
उस सांस से आ रही थी रोशनी की खबर भी छनकर,
दिल मंजूर करता ना था फिर भी ले ही ली टक्कर,
हौसले मंद, रूह को भी आजमा लूं धड़कनें गिनकर,  
तांडव कर भैरवी गाऊँ, खरज लगाऊँ नया राग छेड़कर,
बन गया दरिया बिगडैल दरख़्तों को संग बहाकर,
सख्त चट्टानी केनवास को आसान कूचियों सा रंगकर,
मिली जो नदी एक मोड़ पर घुल गया था उसी में समाकर,
मंद मंद बहूँ , कभी शांत झील सा पाकर विस्तार,
गगन के लाखों अक्स मेरी सतह पर मिटते चमककर,
किनारों सटे हरे भरे जीवन रंग सजे जल-थल और नभचर,
गूंजते घडियाल, खुशियाँ सजती पर्वों का जशन लेकर,
देख ली मौत की चीत्कार भी मुक्त हो इहलोक भोगकर,
समझा हूँ देर सवेर इशारे जीने के इस जिंदगी से मिलकर,
गंदला मैलापन बहाया चट्टानी हसरतों को कर जर्जर,
शिकवा नहीं कोई, जीभर के जिया हूँ अब सो रहूँगा,
किसी खारे समंदर की आगोश मे दफ़न होकर .......।
है इंतज़ार किसी रोज सूरज को आया जो रहम मुझपर,
पुनः भाप बन कर जा मिलूँगा बादलों से कर हवाई सफ़र,
छूट रज किनारों की कैद से मिलूंगा बनकर 'बर्फ का बीज'।
       
        By  ~प्रदीप यादव ~






अनुपमा

अनुपमा 

बस यूं समझो भावनाओं को
कह  लेने को लिख लेते हैं।
अवशेष रजकणों की रेख को ,
मूर्त रूप कर लेते हैं।
तुम बांधना शब्दों में,
जीवन के विस्तारों को।
हम भी अपना एक कोना,
भींच कर सहेज लेते हैं।
उदास आसमानों पर,
बादलों की कल्पना,
भीगी हवा के सोंधेपन से,
गमकती अल्पना,
भावना की स्याही से,
रचे हर्फ़ॊ को तुम जब भी पढ़ना।
स्मृतियों के पटल पर,
उजास छवि बन दमकना,
तुम हे अनुपमा ... ।


हमको, तुमको अपनेपन
से जोडती है लेखनी,
दो विलग वैचारिकता
का मेल बैठाती सी कुंडली।
तीर आलोचना का भेदता,
अंतस में व्याप्त श्रेष्ठता,
समायोजन का सूचक
तौलता,
व्यवस्था की उत्कृष्ठता,
रंगीन कल्पना का,
श्वेत-श्याम, अभिसार,
निस्तब्ध मौन को ,
झिंझोड़ता सा प्रहार।

जीवन की विदीर्णता का,
संभाव्य तलाशते हम,  
समरसता से दो चार हो,
ढांक कर छुपाई गई ,
कण कण परिलक्षित,
खुशियों को पाने का
'हाहाकार' भुलाने को लिख लेते हैं।


~ प्रदीप यादव ~

Friday, 23 November 2012

जिक्र छिड ही जाता था तेरे आने का ...

भीगती रातों की तन्हाई
यूँ ही काट लेता हूँ ।
आवाज देकर सहर को
फिर करीब बुलाता हूँ ।
तौबा करके रिवाजों से फिर
उल्फत में पड़ जाता हूँ।
नसीब मेरे कोई नवाबी
ठाठ गढ़ने के रहे होंगे ,
तभी तो तकदीर से ज्यादा
दर्द,सहने की इमदाद पाता हूँ ।
वक्त मुझ पर रहम कर
देर तक परेशान नही करता,
बेचारा किस्मत के हवाले कर मुझे,
बस आगे बढ़ जाता है।
मैं ही गाहे बगाहे उनकी नज़रों
से तकरीरें किया करता हूँ,
मुझे शक है हाज़िर जवाब नजरों
को बहाने अब भी याद कई होंगे।
फूल कल ये भी तो  पुराने  होंगे,
खुशबू-ओ-रंगत से बेगाने होंगे। 
दोस्ती में हासिल अहसास भी
जाने पहचाने होंगे,
मेरे जेहन के बागीचे में खयालों
के नजराने होंगे।         ............ प्रदीप यादव (स्व-रचित) 27/10/2012







Tuesday, 20 November 2012

फांसी आतंक को

फांसी आतंक को

फांसी तो दी गई ,
परंतु फांस रह गयी बाक़ी,
बैखौफ दुश्मन है पड़ोसी,
घ्रणित इरादों का है दोषी,
रहेगी याद क्या अंडा सेल बिरयानी,
शायद युद्ध आखिरी रहा है बाकी,
भारी पड रही शपथ ये मिलावटी,
न्याय में देरी और सुस्त राजनीति ,
संरक्षित होती रही लोकप्रिय अनीति,
आओ हटाएं नेताओं की सस्ती प्रीति ,
अब और शहीदों की चिताओं को
नहीं मिलेगी असमय आग,
ख़त्म करो आतंक को
कर सुपुर्द ए ख़ाक,
विनाश का अर्थशास्त्र पढ़ने वाले,
तेरे घर पर भी रहते होंगे,
नजरों के तारे, मीठे त्यौहार,
संगीत गूंजता संसार,
फिर काहे की खलिश हैं, बाक़ी,
फांसी तो दी गई,
परन्तु फांस रह गयी बाक़ी .......... प्रदीप स्व-रचित 23 NOV 2012


Badi minnton se sikhi thi adaa salaamati ne,
bahut lahu piya hai in BEJAAN hatiyaaron ne ..... by Pradeep Yadav







Tuesday, 13 November 2012

शुभ - लाभ की समृधि

  शुभ - लाभ  की समृधि
"शुभ" कार्य  करें, तो  जीवन में  शुभ फल  प्राप्त होते हैं।
शुभ-कार्य  का  अशुभ  फल हो  यह संभव नहीं, जीवन में
महत्व इस बात पर हो कि विचारों में शुभता हो। वैचारिक
शुभता से ही संस्कारों का उन्नयन होगा, फिर कर्मफल भी
जीवन  में शुभता का  संचरण  करते  हैं। शुभता न  केवल  
भौतिक होती है, वरन  आध्यात्म,  मन  और तन  की  भी 
होनी  आवश्यक  हैं। जीवन  में शुभ  करने  की यथासंभव
कोशिश करनी चाहिए।
जीवन  आनंददायी  एवं  शांतिपूर्ण  है  तो  यह  जीवन  का 
"लाभ"  है। धन की महत्ता से इनकार नहीं है। लेकिन धनी
व्यक्ति परिपूर्ण रूप से  स्वस्थ न हो तब धन से बेहतर हो,
हम  स्वस्थ  रहें, यह  हमारे जीवन  के  बड़े  लाभ   में से
एक है। लाभ  की प्रार्थना  में  संसाधनों का प्रवाह सदा बना
रहे और इच्छित फल जैसे  कला या ज्ञान से धन और यश
प्राप्त हो रहा है  वह  अक्षुण्य रहे। "लाभ"  लिखने से तात्पर्य
है कि परिवार  में धन की निर्बाध प्राप्ति होती रहे।

Sunday, 4 November 2012

मेले का बांसुरीवाला


मेले का बांसुरीवाला

______________________________
                      by -  ~ प्रदीप यादव ~

.......कितना प्यारा वादा है इन मतवाली आँखों का  ....   फिल्मी

धुन बड़ी ही सुंदर ढंग से बांसुरी पर बज रही थी सड़क पर ...
एक बांसुरी वाला मधुर धुन  बजाता हुआ बांसुरियां  बेच रहा था।
प्यास  लगी, तो बजाना रोक वह नजदीकी  मकान के भाईसाहब
से इशारों में पानी देने की  गुजारिश करने लगा। साहब ने तल्खी
मना किया और अपने  मोबाईल पर बात करने में व्यस्त हो गए,
तभी भीतर से  नाजुक हाथों ने बांसुरी  वाले को पानी का गिलास
पकड़ा दिया। बांसुरी वाले ने पानी  पीकर अंग्रेजी में 'थेंक्यु', कहा
आगे बढ़ गया, भीतर से एक जोड़ी आँख उसे ओझल होते देखती
रहीं, पर शायद उन भाईसाहब  को नागवार  गुजरा उन्होंने बच्चे
को हिकारत भरी नज़र से देखा और फोन पर  बतियाने लगे, इस
वाकये से बच्चा भी सहम कर घर के अन्दर हो लिया।
कुछ दिन बाद बांसुरी वाला फिर लौटा पर  शायद  इस बार भाई-
साहब नही थे । बच्चा  दौड़कर  भीतर से  पानी  का  गिलास भर
लाया। बांसुरी वाले भईया .... आवाज दे उसने उसे पानी पीने का
आग्रह किया। बांसुरीवाले ने  इधर-उधर देखा फिर पानी पीते हुए
एक बांसुरी उसकी और बढा दी, बच्चे ने  हिचकते हुए लेने से  ना
कहा ....पर तब तक बाँसुरीवाला आगे बढ चुका था। बच्चा बांसुरी
ले मुस्कुराता हुआ घर के भीतर चला जाता है।
दुसरे दिन बांसुरी वाला  बड़ी ही मधुर  तान बजाता हुआ बच्चे के
घर के पास से गुजरा  पर वहां  उसकी पहले दिन वाली बांसुरी के
के टुकड़े घर के गेट  के बाहर पड़े देख  आसपास नज़र दौड़ाई  तो
उपरी मंजिल पर खड़े बच्चे का  रूंआसा चेहरा देख जैसे उसे कुछ
बोध हुआ। परन्तु उस दिन के बाद से बांसुरी वाला रोज़ आता पर
बिना  बांसुरी बजाऐ ही सामने  से गुजर जाता था। भाईसाहब भी
इस दौरान उसे कई बार घूर कर देखा करते।
कुछ और दिनों बाद बच्चे का परिवार कार्तिक मेले में घूमने आया।
एक बडे झूले के  किनारे बच्चे  खुश दिखाई  दे रहे थे। तभी भाई-
साहब बच्चों को झूले का टिकिट दिलाने लाइन में लग गए। बच्चे
के साथ आई  महिला ने उसे  बांसुरी  वाले से  बाँसुरी दिला दी बस
अब नया दृश्य बडा मनोहारी था। बांसुरी वाला जो भी धुन बजाता
बच्चे को हुबहू उसकी  जुगलबंदी करते देख परिवार  के लोग और
मेला घूम  रहे अन्य लोगों की आँखों  में प्रशंसा का भाव साफ पढ़ा
जा सकता था।
महिला बांसुरी  वाले से बोली, " ये अच्छी बांसुरी बजा लेता है, ना
बांसुरी वाले भइया .... ?
बांसुरी वाले प्रति-उत्तर दिया  ..जी, मेडम जी, बहुत प्यारी बजाता
है,  पर भाईसाहब  के डर से घर के आगे वाले चौराहे पर मंदिर में,
मैंने ही उसे बजाना सिखाई थी ।
इसके पापा ही इसे शौक से दिला दिया करते थे .....। यह कहते ही
उस की आँखे डबडबा गइ।
दीदी, तुम अब उस आदमी के लिए आंसू बहाने बंद करो ..... और
ये लो, झूले के टिकिट .....भाईसाहब की आवाज गूंजी ! .. महिला
की चेतना जैसे यथार्थ में लौटी, फिर संयत होते हुए उसने टिकिट
लिए और  प्रशंसा भरी नजरों से बच्चे को देखा, फिर सर पर हाथ
फेर कर अपने पास भींच लिया।
 .....कहने को  साथ अपने दुनिया चलती है, बस तेरी याद बाकी है,
परोक्ष में फिल्मी गीत बांसुरी वाला बजा रहा था ,  बच्चा  ख़ुशी से
चहकते  झूले का आनंद ले रहा था।  ...बांसुरी  वाले  की  प्यास ने
बच्चे की दुनिया को नया अध्याय जो दे दिया था ।
  --------------------------------------------------
  ~  प्रदीप यादव ~ (स्व-रचित, 06 नवंबर 2012 )




 इंसानी हौसले ...
--By ....प्रदीप यादव-------
जानते हो इन उबड़खाबड़
भूखंडों की संरचना के पीछे से
झांकते समय वोह आदमी जो
रंगीन चश्मों का दायरा छोड़ 
कर मेरे ओज को बेतकल्लुफी
से सारा दिन तकते मुस्कुराता
हुआ अपना काम निपटाता है।
उसे देख मेरा मन भर आता है,
आजकल थोड़ी तपन समेट ली है
जरा देर, सही इस इंसानी हौसले
से मुतासिर तो हो  लिए । .....प्रदीप यादव (स्व- रचित )

Thursday, 1 November 2012

Ardhagini ko Uphar ...


Ardhagini ko Uphar ...

Na reshmi dor bandhee ho,na moti sitaron sazi ho,
mere tohfe main agaadh prem ki shapath gunthi ho.
Koi do rai nahi ,hoga wahi ,jo chaho tumhi ,
Sathi  ho wohi, Sarthee bhi tumhi,

Kuch der se hi sahi,akal aa hi gyee,
mere ego ko bas tuhi bha gyee,
rukh mila zindgee ban gayee,
raza ho jis me teri wo khushi mil gayee,

Kya doge tum sangnee ban gayee,
naseeb se tumse mili,
pallavit tum sang bel ban chadhi,
pushpit ho mansi ban gayee,
sangharshon ke sathee tumse meri hasti ban gyee.....

Chutki bhar sindur ne aangan baabul ka door kiya,
ek gathbandhan se tumhar jeevan Suhas kiya,
dukha nirasha bhay clantta ke bhav ko nirmul kiya,
anupam anmol sath ne soubhagya bhar jivan sarthak kiya

  ~
प्रदीप यादव  ~
....जीवन यात्रा पर निकले सहयात्री ही जीवनसाथी होते हैं । पति-पत्नी सामाजिक संरचना का सम्मान रखने के लिए समझौते की ज़िन्दगी जीते हैं। आपस का प्यार और दोस्ती जरुरी है, भावना अक्सर साथ लेकर चलने की होनी चाहिए।

~ प्रदीप यादव  ~