Thursday, 27 December 2012
Wednesday, 26 December 2012
परित्राण
परित्राण .....
नए क़ानून की आवश्यकता पर ...
अदा ठहरी हुक्मरानों की
वो थे हुजुर ए आला,
क्यूँ बनाए नया फिर से,
जब है इम्पोर्टेड वाला ..... प्रदीप यादव
ऊंची इमारतों के बीच गुम धुप .....
धूप का कतरा है कोई मेरे झोपड़े को रोशन कर रहा,
खुदारा सूरज भी महल़ों के शाने से मेहरबान हो रहा । by ..... प्रदीप यादव
कितने दिनों के बाद ठण्ड ने ये रौनक है पाई ,
देख रहा हूँ जहां से मैं सूरज को झुरझुरी सी आई । By ..... प्रदीप यादव
Tuesday, 25 December 2012
किसने क्या सीखा ज़िन्दगी से .....
रब ने तो भेजे थे
गमो ख़ुशी के पास ,
मैं काँटों को चुनने लगा रहा,
उन्हों गुलों करीब आशियाना बना लिए। .... प्रदीप यादव
किसी की चाहतों को दिल में बसाकर मंजिलों पर बढ़ जो चले हो,
निगाहों पर निगहबानी रखना चोट खाए इस कारवां में बहुत हैं। .....BY.... प्रदीप यादव
अब मिला हैं रोज़गार जो लबों पर सुर्खियाँ सजाने का,
सुनते हैं ये 'पान' भी बेकरार हैं लज्ज़तों के खजाने सा । .... BY ....प्रदीप यादव
बोल दो टूक ...
लिखी बांची सब बोल गया
दुनियादारी को टटोल गया,
मैं लड़ने आया था,
शब्दों में गंद घोल गया,
उठा कुछ नश्तर सा ,
दिल में था चुभ रहा,
हंगामाखेज सी हलचल,
मन को जला रही थी।
घिर चुका था सोच कर,
उठ रहे सवालों की शमशीरों से,
सुन पिघले सीसे सी तहरीरों से,
क्या बचाता दामन ये आग से,
पिलाई गई घुट्टी का
शिकार बनना तय था,
समाज की इन्द्राज में एक
खाता मेरा जो था।
By ...... प्रदीप यादव 12/12/1
Monday, 24 December 2012
सारी रात सुनी अदब ओ तहज़ीब की लियाकतें ...
कल मुशायरे की रात थी परदेसी था मेहमां मेरा।
हालात थे जंगी पर माहौल पुरसुकूं हुआ,
नदीम जब मुखातिब हुए देवबंद से आए,
वोह पियाले-पियाले पिलाते गए,
रहा आबे ज़मज़म का सा मुरीद उनका,
ये शहर-ए-'राहत' मेरा ....
दिल में उतरती गई लफ्ज़ दर लफ्ज़
सीख ऐ 'मुन्नव्वर' ....
लबों पे तारी था बस ... वाह क्या कहना .....
मुशायरा "शब् ए सुखन " 21दिस.2012 इंदौर के अभय प्रशाल में
रिपोर्ट By... Pradeep Yadav
ये सोचते थे उस रात मुशायरे में दानिशमंद सफीर जनाब डॉ. राहत 'इन्दोरी'
हम अपने शहर में सौ-सौ जन्नतें बनाएंगे,
लेकिन दोस्तों इतने फरिश्ते कहाँ से लाएंगे ...... By राहत "इंदौरी"
इसी गली में वो भूखा किसान रहता है।
ये वो जमीं है जहाँ आसमान रहता है।।
मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े।
कि इस पे चिड़ियों का इक खानदान रहता है।।
सड़क पे घूमते पागल की तरह दिल है मेरा।
हमेशा चोट का ताजा निशान रहता है।।
तुम्हारे ख्वाबों से आँखों महकती रहती हैं।
तुम्हारी याद से दिल जाफरान रहता है।।
ग़ज़ल संग्रह 'सब उसके लिए' -पृष्ठ संख्या 88 से ( by ..मुन्नवर राना )
मौला सुखन ऐ मुन्नवर को लम्बी उम्र दे ,
इस औलिया में सुकून-ओ- ईमान रहता है।
~ प्रदीप यादव ~
Sunday, 23 December 2012
एक चिड़िया का रूदन ...
एक चिड़िया का रूदन ...
BY .... प्रदीप यादव
चिड़िया ने देखी उड़ान कहाँ,
भरम टूट गया आजादी का,
बेडी पहन जीने में जश्न कहाँ,
फिरती किन आस पर शाखों,
की गिनती कर झुके नरम से,
सहारे को आशियाँ बना फुदक,
रही थी परों की जोर पर,
अनजान,थी शिकारी पंजों की
रूह को अपमानित करती घेर,
बिछुड़ा साथी सपने भी हुए ढेर,
घायल तन मन पड़ी तड़पती,
लूट कर शिकारी गया था फ़ेंक,
लुटी चिड़िया का दुख देख कहिं,
चिड़ियों का झुण्ड एक गुस्साया,
अपनी छोटी कोशिश से निज़ाम,
को भी उसने पुरज़ोर दहलाया,
कोशिश चिड़िया की रंग लाएगी,
आजादी उड़ने की फिर पाऐगी,
मत रुकना तुम ऐ दोस्त चिड़ियों,
मेरी मौत क्या व्यर्थ हो जाएगी,
कालिख मत पोत शोक करो,
मेरी लाश का बस आभार मानो,
फेंकी गई में जिस तरह लाल,
रंग से सज कर तुम शान से,
सूर्य की सी अड़ ठान कर कर,
मेरे तेरे की बात नहीं करना,
इस लड़ाई की ज़रूरत सोचकर,
तब तक तो तुम अवश्य लड़ना,
विध्वंस करो हर अहंकारी का,
मन तो बदलो हाहाकारी का......
मन से देती तुम्हें शुभकामना,
झिंझोड़ कर रखना शिकारी को,
तुम मेरी सी ही फिर स्वतंत्र सदा,
उडती रहना ... उड़ती रहना ... उडती रहना ।
.. BY ....~ प्रदीप यादव ~ 24 दिसंबर 2012
लोग समझते रहे कि चिराग हुए हैं रोशन महफ़िल करने,
तू ही समझा या मैं जाना दास्ताँ दिल ये अंगार करने की। ....By प्रदीप यादव
Wednesday, 19 December 2012
Tuesday, 18 December 2012
बोल दो टूक ...
बोल दो टूक ...
लिखी बांची सब बोल गया
दुनियादारी को टटोल गया,
मैं लड़ने आया था,
शब्दों में गंद घोल गया,
उठा कुछ नश्तर सा ,
दिल में था चुभ रहा,
हंगामाखेज सी हलचल,
मन को जला रही थी।
घिर चुका था सोच कर,
उठ रहे सवालों की शमशीरों से,
सुन पिघले सीसे सी तहरीरों से,
क्या बचाता दामन ये आग से,
पिलाई गई घुट्टी का
शिकार बनना तय था,
समाज की इन्द्राज में एक
खाता मेरा जो था।
By ...... प्रदीप यादव 12/12/12
भावनाएं जो कह गया ....
भावनाएं जो कह गया ....
समृधि की ओर बढने वाले ....
कहते रहते कहने वाले कब रुके हैं चलने वाले,
मेरे घर का रास्ता और मंजिल दोनों तय हैं ,
मिलते रहते मिलने वाले खोए कब हैं रखवाले,
मौसम नरम गरम पर दिनकर का चक्र तय है ...
उम्मीदों के सहारे ना घिसटते रहना जीने वाले,
बड़े ठग होते हैं किबला रंगीन सपने दीखाने वाले।
मंजे हुए होते दिलबर के दिल को धड्काने वाले ,
टूटे अरमानों को अपनी मजबूरी बतलाने वाले।
बढ़े चल काँटों भरे सफर का राहगीर बनकर
इस डगर में मिले थे मुझसे कई दाँव लगाने वाले। .......स्वरचित प्रदीप यादव 03 अक्टूबर 2012
नाज़ ऐ हुस्न
पूजे सभी ने हुस्न के रास रंग,
कोई फ़िदा होकर रिहा हुआ,
कोई गिरफ्त के हवाले हुआ,
परचम फैलाते रहे राजा रंक,
सजा कर बैठे थे वो मस्कारा,
आईने कैसे जाने सलामी का ढंग .....प्रदीप यादव 29 सितम्बर 2012
दर्दे करीबी ....
खरे सोने सा था,
वो दिल का मरीज़ ,
मर्जे दिल से था परेशां,
या दिल की मर्जी से ,
एक हलकान से दिन।
आ पहुंचा बस,
कहने रात की बात,
थोड़ी देर ही लड़ा था।
हरारत क्या हुई ,
घरवालों ने आसमान
सर कर दिया । .....स्वरचित प्रदीप यादव 7 सितम्बर 2012
समृधि की ओर बढने वाले ....
कहते रहते कहने वाले कब रुके हैं चलने वाले,
मेरे घर का रास्ता और मंजिल दोनों तय हैं ,
मिलते रहते मिलने वाले खोए कब हैं रखवाले,
मौसम नरम गरम पर दिनकर का चक्र तय है ...
उम्मीदों के सहारे ना घिसटते रहना जीने वाले,
बड़े ठग होते हैं किबला रंगीन सपने दीखाने वाले।
मंजे हुए होते दिलबर के दिल को धड्काने वाले ,
टूटे अरमानों को अपनी मजबूरी बतलाने वाले।
बढ़े चल काँटों भरे सफर का राहगीर बनकर
इस डगर में मिले थे मुझसे कई दाँव लगाने वाले। .......स्वरचित प्रदीप यादव 03 अक्टूबर 2012
नाज़ ऐ हुस्न
पूजे सभी ने हुस्न के रास रंग,
कोई फ़िदा होकर रिहा हुआ,
कोई गिरफ्त के हवाले हुआ,
परचम फैलाते रहे राजा रंक,
सजा कर बैठे थे वो मस्कारा,
आईने कैसे जाने सलामी का ढंग .....प्रदीप यादव 29 सितम्बर 2012
दर्दे करीबी ....
खरे सोने सा था,
वो दिल का मरीज़ ,
मर्जे दिल से था परेशां,
या दिल की मर्जी से ,
एक हलकान से दिन।
आ पहुंचा बस,
कहने रात की बात,
थोड़ी देर ही लड़ा था।
हरारत क्या हुई ,
घरवालों ने आसमान
सर कर दिया । .....स्वरचित प्रदीप यादव 7 सितम्बर 2012
राष्ट्र आराधन ....
राष्ट्र आराधन ....
धर्म हानि नहीं जानूँ मैं अभिमानी,
भस्मभूत करता अनीति की मनमानी,
राष्ट्र हानि फड़काती हैं रुधिर वाहिनी।
देश धर्म का पालन कर मैं,
कहलाऊं सिर्फ एक हिन्दुस्तानी।
उद्धार करो भारतवासी,
श्रम के इस मंदिर का,
गर्व मीनारों से अजां लगाओ,
सुमिरन कर गुरुओं की बानी,
राष्ट्र आराधन की लौ जला,
करो याद उनको भी जरा,
जो शान तिरंगे की रख लड़ मरा।
अमोघ श्रँखला विस्तृत ज्ञान की,
कला,विज्ञान की,अभिमान की,
राष्ट्र कुल ही मेरा कुल अब,
माता भारत भारती।
करो रे उपक्रम समृध देश का,
गाओ फिर यशवर्धन की आरती ।
चलो आओ,मिलकर नाचो, गा लो,
ढोल ताशोंऔर नगाड़ों की थाप से,
अकर्मण्यता के असुर भगा दो। ...... ~ प्रदीप यादव ~
धर्म हानि नहीं जानूँ मैं अभिमानी,
भस्मभूत करता अनीति की मनमानी,
राष्ट्र हानि फड़काती हैं रुधिर वाहिनी।
देश धर्म का पालन कर मैं,
कहलाऊं सिर्फ एक हिन्दुस्तानी।
उद्धार करो भारतवासी,
श्रम के इस मंदिर का,
गर्व मीनारों से अजां लगाओ,
सुमिरन कर गुरुओं की बानी,
राष्ट्र आराधन की लौ जला,
करो याद उनको भी जरा,
जो शान तिरंगे की रख लड़ मरा।
अमोघ श्रँखला विस्तृत ज्ञान की,
कला,विज्ञान की,अभिमान की,
राष्ट्र कुल ही मेरा कुल अब,
माता भारत भारती।
करो रे उपक्रम समृध देश का,
गाओ फिर यशवर्धन की आरती ।
चलो आओ,मिलकर नाचो, गा लो,
ढोल ताशोंऔर नगाड़ों की थाप से,
अकर्मण्यता के असुर भगा दो। ...... ~ प्रदीप यादव ~
Monday, 17 December 2012
भारत पुत्र रासो
भारत पुत्र रासो
दैदीप्यमान हैं,
परम्परा विश्व के वितान पर,
लक्ष्य सिद्धि फल अनुष्ठान
हो रहे यज्ञ वेदी पर ,
सर्वलौकिक हो दृष्टि
मानवीयता के सर्वनाम पर,
निमित्त तुम बन जाओ
उपादानों का संज्ञान कर,
बलवीर हो प्रणों
शारीरिक सौष्ठव को संपन्न कर,
विवेक का प्रमाण दर्शाओ
काल का कीर्तिमान कर,
कृपण, निष्ठुर, अमानुषक पंथ को,
निराधार निर्बल कर,
जीवेत हे भारतेय,
युग युगों पर्यंत पथ प्रशस्त कर ।
By .... प्रदीप यादव ( स्व-रचित )
Subscribe to:
Comments (Atom)
